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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 26

मृतकोंके लिये जलांजलि देकर बैठे हुए धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके पास बहुतसे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि सिद्ध महात्मा पधारे ॥ ३ ॥
द्वैपायनो नारदश्च देवलश्च महानृषिः ।
देवस्थानश्च कण्वश्च तेषां शिष्याश्च सत्तमाः ॥ ४ ॥
द्वैपायन व्यास, नारद, महर्षि देवल, देवस्थान, कण्व तथा उनके श्रेष्ठ शिष्य भी वहाँ आये थे ॥ ४ ॥
अन्ये च वेदविद्वांसः कृतप्रज्ञा द्विजातयः ।
गृहस्थाः स्नातकाः सन्तो ददृशः कुरुसत्तमम् ॥ ५ ॥
इनके अतिरिक्त अनेक वेदवेत्ता एवं पवित्र बुद्धिवाले ब्राह्मण, गृहस्थ एवं स्नातक संत भी वहाँ आकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे मिले ॥ ५ ॥
तेऽभिगम्य महात्मानः पूजिताश्च यथाविधि ।
आसनेषु महार्हेषु विविशुस्ते महर्षयः ॥ ६ ॥
वे महात्मा महर्षि वहाँ पहुँचकर विधिपूर्वक पूजित हो राजाके दिये हुए बहुमूल्य आसनोंपर विराजमान हुए ॥ ६ ॥
प्रतिगृह्य ततः पूजां तत्कालसदृशीं तदा ।
पर्युपासन् यथान्यायं परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥
पुण्ये भागीरथीतीरे शोकव्याकुलचेतसम् ।
आश्वासयन्तो राजानं विप्राः शतसहस्रशः ॥ ८ ॥
उस समयके अनुरूप पूजा स्वीकार करके वे सैकड़ों हजारों ब्रह्मर्षि भागीरथीके पावन तटपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर आश्वासन देते हुए यथोचितरूपसे उनके पास बैठे रहे ॥ ७-८ ॥
नारदस्त्वब्रवीत् काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
सम्भाष्य मुनिभिः सार्धं कृष्णद्वैपायनादिभिः ॥ ९ ॥
उस समय श्रीकृष्णद्वैपायन आदि मुनियोंके साथ बातचीत करके सबसे पहले नारदजीने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ९ ॥
भवता बाहुवीर्येण प्रसादान्माधवस्य च ।
जितेयमवनिः कृत्स्ना धर्मेण च युधिष्ठिर ॥ १० ॥
महाराज युधिष्ठिर! आपने अपने बाहुबल, भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा तथा धर्मके प्रभावसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ १० ॥
दिष्ट्या मुक्तस्तु संग्रामादस्माल्लोकभयंकरात् ।
क्षत्रधर्मरतश्चापि कच्चिन्मोदसि पाण्डव ॥ ११ ॥
'पाण्डुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि आप सम्पूर्ण जगत्‌को भयमें डालनेवाले इस संग्रामसे छुटकारा पा गये। अब क्षत्रियधर्मके पालनमें तत्पर रहकर आप प्रसन्न तो हैं