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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2373, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2373

ॐ कारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता ।। ५१ ।।
दन्ताश्च पितरो राजन् सोमपा इति विश्रुताः ।
गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः ।। ५२ ।।
चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों नेत्र तथा नासिका संध्या थी। ॐकार संस्कार (आभूषण) और विद्युत् जिह्वा बनी हुई थी। राजन्! सोमपान करनेवाले पितर उनके दाँत सुने गये हैं तथा गोलोक और ब्रह्मलोक उन महात्माके ओष्ठ थे ।। ५१-५२ ।।
ग्रीवा चास्याभवद् राजन् कालरात्रिर्गुणोत्तरा ।
एतद्धयशिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् ।। ५३ ।।
अन्तर्दधौ स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः ।
नरेश्वर! तमोमयी कालरात्रि उनकी ग्रीवा थी। इस प्रकार अनेक मूर्तियोंसे आवृत हयग्रीव रूप धारण करके वे जगदीश्वर श्रीहरि वहाँसे अन्तर्धान हो गये और रसातलमें जा पहुँचे ।। ५३ १/२ ।।
रसां पुनः प्रविष्टश्च योगं परममास्थितः ।। ५४ ।।
शैक्ष्यं स्वरं समास्थाय उद्गीतं प्रासृजत् स्वरम् ।
रसातलमें प्रवेश करके परम योगका आश्रय ले शिक्षाके नियमानुसार उदात्त आदि स्वरोंसे युक्त उच्च स्वरसे सामवेदका गान करने लगे ।। ५४ १/२ ।।
स स्वरः सानुनादी च सर्वशः स्निग्ध एव च ।। ५५ ।।
बभूवान्तर्महीभूतः सर्वभूतगुणोदितः ।
नाद और स्वरसे विशिष्ट सामगानकी वह सर्वथा स्निग्ध एवं मधुर ध्वनि रसातलमें सब ओर फैल गयी, जो समस्त प्राणियोंके लिये गुणकारक थी ।। ५५ १/२ ।।
ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान् समयबन्धनान् ।। ५६ ।।
रसातले विनिक्षिप्य यतः शब्दस्ततो द्रुतौ ।
उन दोनों असुरोंने वह शब्द सुनकर वेदोंको कालपाशसे आबद्ध करके रसातलमें फेंक दिया और स्वयं उसी ओर दौड़े जिधरसे वह ध्वनि आ रही थी ।। ५६ १/२ ।।
एतस्मिन्नन्तरे राजन् देवो हयशिरोधरः ।। ५७ ।।
जग्राह वेदानखिलान् रसातल गतान् हरिः ।
प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ।। ५८ ।।
राजन्! इसी बीचमें हयग्रीव रूपधारी भगवान् श्रीहरिने रसातलमें पड़े हुए उन सम्पूर्ण वेदोंको ले लिया तथा ब्रह्माजीको पुनः वापस दे दिया और फिर वे अपने आदि रूपमें आ गये ।। ५७-५८ ।।
स्थापयित्वा हयशिर उदक्पूर्वे महोदधौ ।
वेदानामालयं चापि बभूवाश्वशिरास्ततः ।। ५९ ।।