महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2345, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनारदजीने जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित हुए जगन्नाथ श्रीहरिका दर्शन किया और पुनः जो वे वहाँसे देवश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये उनके पास दौड़े गये, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ६ १/२ ॥
सौतिरुवाच
तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने राज्ञः पारिक्षितस्य वै ॥ ७ ॥
कर्मान्तरेषु विधिवद् वर्तमानेषु शौनक ।
कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषिं वेदनिधिं प्रभुम् ॥ ८ ॥
परिपप्रच्छ राजेन्द्रः पितामहपितामहम् ।
**सूतपुत्रने कहा—**शौनक! राजा जनमेजयका वह यज्ञ विधिपूर्वक चल रहा था। उसमें विभिन्न कर्मोंके बीचमें अवकाश मिलनेपर राजेन्द्र जनमेजयने अपने पितामहोंके पितामह वेदनिधि भगवान् कृष्णद्वैपायन महर्षि व्याससे इस प्रकार पूछा ॥ ७-८ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
श्वेतद्वीपान्निवृत्तेन नारदेन सुरर्षिणा ॥ ९ ॥
ध्यायता भगद्वाक्यं चेष्टितं किमतः परम् ।
**जनमेजय बोले—**भगवन्! भगवान् नारायणके कथनपर विचार करते हुए देवर्षि नारद जब श्वेतद्वीपसे लौट आये, तब उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ ९ १/२ ॥
बदर्याश्रममागम्य समागम्य च तावृषी ॥ १० ॥
कियन्तं कालमवसत् कां कथां पृष्टवांश्च सः ।
बदरिकाश्रममें आकर उन दोनों ऋषियोंसे मिलनेके पश्चात् नारदजीने वहाँ कितने समयतक निवास किया और उन दोनोंसे कौन-सी कथा पूछी? ॥ १० १/२ ॥
इदं शतसहस्राद्धि भारताख्यानविस्तरात् ॥ ११ ॥
आमन्थ्य मतिमन्थेन ज्ञानोदधिमनुत्तमम् ।
एक लाख श्लोकोंसे युक्त विस्तृत महाभारत इतिहाससे निकालकर जो आपने यह सारभूत कथा सुनायी है, यह बुद्धिरूपी मथानीके द्वारा ज्ञानके उत्तम समुद्रको मथकर निकाले गये अमृतके समान है ॥ ११ १/२ ॥
नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा ॥ १२ ॥
आरण्यकं च वेदेभ्य ओषधिभ्योऽमृतं यथा ।
समुद्धृतमिदं ब्रह्मन् कथामृतमिदं तथा ॥ १३ ॥
ब्रह्मन्! जैसे दहीसे मक्खन, मलयपर्वतसे चन्दन, वेदोंसे आरण्यक और ओषधियोंसे अमृत निकाला गया है, उसी प्रकार आपने यह कथारूपी अमृत निकालकर रखा है ॥ १२-१३ ॥
तपोनिधे त्वयोक्तं हि नारायणकथाश्रयम् ।