महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2286, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनाशयिष्यामि ततः सर्वान् सौभनिवासिनः ।
तदनन्तर सहस्र भुजाओंसे सुशोभित बलिपुत्र बाणासुरको पराजित करके शाल्वके सौभ विमानमें रहनेवाले समस्त योद्धाओंका विनाश कर डालूँगा ॥ ९४ १/२ ॥
यः कालयवनः ख्यातो गर्गतेजोऽभिसंवृतः ॥ ९५ ॥
भविष्यति वधस्तस्य मत्त एव द्विजोत्तम ।
द्विजोत्तम! गर्गाचार्यके तेजसे उत्पन्न होकर शक्तिशाली बना हुआ जो कालयवन नामक विख्यात असुर होगा, उसका वध भी मेरे ही द्वारा सम्भव होगा ॥
जरासंधश्च बलवान् सर्वराजविरोधनः ॥ ९६ ॥
भविष्यत्यसुरः स्फीतो भूमिपालो गिरिव्रजे ।
मम बुद्धिपरिस्पन्दाद् वधस्तस्य भविष्यति ॥ ९७ ॥
गिरिव्रजमें जरासंध नामक एक बहुत समृद्धिशाली और बलवान् असुर राजा होगा, जो सम्पूर्ण राजाओंसे वैर मोल लेता फिरेगा। मेरे ही बौद्धिक प्रयत्नसे उसका भी वध हो सकेगा ॥ ९६-९७ ॥
शिशुपालं वधिष्यामि यज्ञे धर्मसुतस्य वै ।
समागतेषु बलिषु पृथिव्यां सर्वराजसु ॥ ९८ ॥
धर्मपुत्र युधिष्ठिरके यज्ञमें भूमण्डलके समस्त बलवान् राजा पधारेंगे, उनके बीचमें मैं शिशुपालका वध कर डालूँगा ॥ ९८ ॥
वासविः सुसहायो वै मम त्वेको भविष्यति ।
युधिष्ठिरं स्थापयिष्ये स्वराज्ये भ्रातृभिः सह ॥ ९९ ॥
एकमात्र इन्द्रकुमार अर्जुन मेरा सखा एवं सुन्दर सहायक होगा। मैं राजा युधिष्ठिरको उनके भाइयोंसहित पुनः राजपदपर प्रतिष्ठित करूँगा ॥ ९९ ॥
एवं लोका वदिष्यन्ति नरनारायणावृषी ।
उद्युक्तौ दहतः क्षत्रं लोककार्यार्थमीश्वरौ ॥ १०० ॥
उस समयके लोग कहेंगे कि 'ये ईश्वररूप नर और नारायण नामक ऋषि ही एक साथ उद्यत हो लोकहितके लिये क्षत्रियजातिका संहार कर रहे हैं' ॥
कृत्वा भारावतरणं वसुधाया यथेप्सितम् ।
सर्वसात्वतमुख्यानां द्वारकायाश्च सत्तम ॥ १०१ ॥
करिष्ये प्रलयं घोरमात्मज्ञातिविनाशनम् ।
साधुशिरोमणे! पृथ्विदेवीकी इच्छाके अनुसार उसका भार उतारकर मैं द्वारकाके समस्त यादव-शिरोमणियोंका नाश करके अपनी जातिका विनाशरूप घोर कर्म करूँगा ॥ १०१ १/२ ॥
कर्माण्यपरिमेयाणि चतुर्मूर्तिधरो ह्यहम् ॥ १०२ ॥
कृत्वा लोकान् गमिष्यामि स्वानहं ब्रह्मसत्कृतान् ।