महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2278, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ॥ ४५ ॥
सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि ।
'नारद! तुम जो मुझे देख रहे हो, इस रूपमें मैंने माया रची है। तुम मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंके गुणोंसे युक्त न जानो ॥ ४५ १/२ ॥
मयैतत् कथितं सम्यक् तव मूर्तिचतुष्टयम् ॥ ४६ ॥
अहं हि जीवसंज्ञातो मयि जीवः समाहितः ।
नैवं ते बुद्धिरत्राभूद् दृष्टो जीवो मयेति वै ॥ ४७ ॥
'मैंने अपने वासुदेव, संकर्षण आदि चार स्वरूपोंका तुम्हारे सामने भलीभाँति वर्णन किया है। मैं ही जीव नामसे प्रसिद्ध हूँ, मुझमें ही जीवकी स्थिति है; परंतु तुम्हारे मनमें ऐसा विचार नहीं उठना चाहिये कि मैंने जीवको देखा है ॥ ४६-४७ ॥
अहं सर्वत्रगो ब्रह्मन् भूतग्रामान्तरात्मकः ।
भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न नशाम्यहम् ॥ ४८ ॥
'ब्रह्मन्! मैं सर्वव्यापी और समस्त प्राणिसमुदायका अन्तरात्मा हूँ। सम्पूर्ण भूतसमुदाय और शरीरोंके नष्ट हो जानेपर भी मेरा नाश नहीं होता है ॥ ४८ ॥
सिद्धा हि ते महाभागा नरा ह्येकान्तिनोऽभवन् ।
तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः प्रवेक्ष्यन्ति च मां मुने ॥ ४९ ॥
'मुने! ये महाभाग श्वेतद्वीपनिवासी सिद्ध हैं। ये पहले मेरे अनन्य भक्त रहे हैं। ये तमोगुण और रजोगुणसे मुक्त हो गये हैं; इसलिये मेरे भीतर प्रवेश करेंगे ॥ ४९ ॥
हिरण्यगर्भो लोकादिश्चतुर्वक्त्रोऽनिरुक्तगः ।
ब्रह्मा सनातनो देवो मम बह्वर्थचिन्तकः ॥ ५० ॥
'जो सम्पूर्ण जगत्के आदि, चतुर्मुख, अनिर्वचनीय-स्वरूप, हिरण्यगर्भ एवं सनातन देवता हैं, वे ब्रह्मा मेरे बहुत-से कार्योंका चिन्तन करनेवाले हैं ॥ ५० ॥
ललाटाच्चैव मे रुद्रो देवः क्रोधाद् विनिःसृतः ।
पश्यैकादश मे रुद्रान् दक्षिणं पार्श्वमास्थितान् ॥ ५१ ॥
'मेरे क्रोधवश ललाटसे मेरे ही रुद्रदेवका प्राकट्य हुआ है। देखो, ये ग्यारह रुद्र मेरे दाहिने भागमें विराजमान हैं ॥ ५१ ॥
द्वादशैव तथाऽऽदित्यान् वामपार्श्वे समास्थितान् ।
अग्रतश्चैव मे पश्य वसूनष्टौ सुरोत्तमान् ॥ ५२ ॥
'इसी प्रकार मेरे बायें भागमें बारह आदित्य विराज रहे हैं। अग्रभागमें सुरश्रेष्ठ आठ वसु विद्यमान हैं। इन सबको प्रत्यक्ष देखो ॥ ५२ ॥
नासत्यं चैव दस्रं च भिषजौ पश्य पृष्ठतः ।
सर्वान् प्रजापतीन् पश्य पश्य सप्त ऋषींस्तथा ॥ ५३ ॥
वेदान् यज्ञांश्च शतशः पश्यामृतमथौषधीः ।