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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2134, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2134

धर्ममें स्थित रहती हूँ ॥ १८७ ॥
नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी ।
नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप ॥ १८८ ॥
जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञासे कभी विचलित नहीं होती हूँ। बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलती हूँ और आपके पास भी यहाँ खूब सोच-विचारकर ही आयी हूँ ॥ १८८ ॥
मोक्षे ते भावितां बुद्धिं श्रुत्वाहं कुशलैषिणी ।
तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ॥ १८९ ॥
मैंने सुना था कि आपकी बुद्धि मोक्षधर्ममें लगी हुई है, अतः आपकी मंगलाकांक्षिणी होकर आपके इस मोक्षज्ञानका मर्म जाननेके लिये मैं यहाँ आयी हूँ ॥ १८९ ॥
न वर्गस्था ब्रवीम्येतत् स्वपक्षपरपक्षयोः ।
मुक्तो व्यायच्छते यश्च शान्तौ यश्च न शाम्यति ॥ १९० ॥
मैं स्वपक्ष और परपक्षमेंसे अपने पक्षमें स्थित हो पक्षपातपूर्वक यह बात नहीं कह रही हूँ, आपके हितको दृष्टिमें रखकर बोलती हूँ; क्योंकि जो वाणीका व्यायाम नहीं करता और जो शान्त परब्रह्ममें निमग्न रहता है, वही मुक्त है ॥ १९० ॥
यथा शून्ये पुरागारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् ।
तथाहं त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ॥ १९१ ॥
जैसे नगरके किसी सूने घरमें संन्यासी एक रात निवास कर लेता है, इसी तरह आपके इस शरीरमें मैं आजकी रात रहूँगी ॥ १९१ ॥
साहं मानप्रदानेन वागातिथ्येन चार्चिता ।
सुप्ता सुशरणं प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ॥ १९२ ॥
आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया। अपनी वाणीरूप आतिथ्यके द्वारा मेरा भलीभाँति सत्कार किया। मिथिलानरेश! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके शरीररूपी सुन्दर गृहमें सोकर कल सबेरे यहाँसे चली जाऊँगी ॥ १९२ ॥

भीष्म उवाच

इत्येतानि स वाक्यानि हेतुमन्त्यर्थवन्ति च ।
श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किञ्चिदन्यदतः परम् ॥ १९३ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! सुलभाके ये युक्तियुक्त और सार्थक वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद और कोई बात नहीं बोले ॥ १९३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सुलभाजनकसंवादे
विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सुलभा और जनकका संवादविषयक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२० ॥