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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2095, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2095

ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसे आप न जानते हों। वैदिक ज्ञानके तो आप भण्डार ही माने जाते हैं। ब्रह्मन्! देवलोक और पितृलोकमें भी आपकी ख्याति है ॥ ६५ ॥
ब्रह्मलोकगताश्चैव कथयन्ति महर्षयः ।
पतिश्च तपतां शश्वदादित्यस्तव भाषिता ॥ ६६ ॥
ब्रह्मलोकमें गये हुए महर्षि भी आपकी महिमाका वर्णन करते हैं। तपनेवाले तेजस्वी ग्रहोंके पति अदितिनन्दन सनातन भगवान् सूर्यने आपको वेदका उपदेश किया है ॥
सांख्यज्ञानं त्वया ब्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च ।
तथैव योगशास्त्रं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ॥ ६७ ॥
ब्रह्मन्! याज्ञवल्क्य! आपने सम्पूर्ण सांख्य तथा योगशास्त्रका भी विशेष ज्ञान प्राप्त किया है ॥ ६७ ॥
निःसंदिग्धं प्रबुद्धस्त्वं बुध्यमानश्चराचरम् ।
श्रोतुमिच्छामि तज्ज्ञानं घृतं मण्डमयं यथा ॥ ६८ ॥
इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आप पूर्ण ज्ञानी हैं और सम्पूर्ण चराचर जगत्को जानते हैं; अतः मैं माखनमय घीके समान स्वादिष्ट एवं सारभूत वह तत्त्वज्ञान आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६८ ॥

याज्ञवल्क्य उवाच

कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम ।
जिज्ञाससे च मां राजंस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ६९ ॥
याज्ञवल्क्यजीने कहा—अर्थात् मैंने उत्तर दिया—गन्धर्वशिरोमणे! आपको मैं निःसंदेह सम्पूर्ण ज्ञानोंको धारण करनेवाली मेधाशक्तिसे सम्पन्न मानता हूँ। राजन्! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझसे प्रश्न करते और मेरे विचारको जानना चाहते हैं; इसलिये मैंने जैसा सुना है, वह बताता हूँ सुनिये ॥ ६९ ॥
अबुध्यमानां प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशकः ।
न तु बुध्यति गन्धर्व प्रकृतिः पञ्चविंशकम् ॥ ७० ॥
गन्धर्व! प्रकृति जड है, इसलिये उसे पचीसवाँ तत्त्व—जीवात्मा तो जानता है; किंतु प्रकृति जीवात्माको नहीं जानती ॥ ७० ॥
अनेन प्रतिबोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तत् ।
सांख्ययोगाश्च तत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ७१ ॥
सांख्य और योगके तत्त्वज्ञानी विद्वान् श्रुतिमें किये हुए निरूपणके अनुसार जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाके समान प्रकृतिमें ज्ञानस्वरूप जीवात्माके बोधका प्रतिबिम्ब पड़नेसे उस प्रकृतिको प्रधान कहते हैं ॥ ७१ ॥
पश्यंस्तथैव चापश्यन् पश्यत्यन्यः सदानघ ।