महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2053, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी प्राणियोंके मनमें शुभ और अशुभ विचार उठते रहते हैं। मनुष्यको चाहिये कि वह चित्तको सदा अशुभ विचारोंकी ओरसे हटाकर शुभ विचारोंमें ही लगाये ॥ १९ ॥
सर्वं सर्वेण सर्वत्र क्रियमाणं च पूजय ।
स्वधर्मे यत्र रागस्ते कामं धर्मो विधीयताम् ॥ २० ॥
अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सबके द्वारा सब जगह किये जानेवाले सब प्रकारके कर्मोंका आदर करो। तुम भी अपने धर्मके अनुसार जिस कर्ममें तुम्हारा अनुराग हो, उसका इच्छानुसार पालन करते रहो ॥ २० ॥
अधृतात्मन् धृतौ तिष्ठ दुर्बुद्धे बुद्धिमान् भव ।
अप्रशान्तः प्रशाम्य त्वमप्राज्ञः प्राज्ञवच्चर ॥ २१ ॥
अधीरचित्त नरेश! धीरताका आश्रय लो। दुर्बुद्धे! बुद्धिमान् बनो। तुम सदा अशान्त रहते हो। अबसे शान्त हो जाओ और अबतक मूर्खोंके-से बर्ताव करते रहे, अब विद्वानोंके समान आचरण करो ॥ २१ ॥
तेजसा शक्यते प्राप्तुमुपायः सहचारिणा ।
इह च प्रेत्य च श्रेयस्तस्य मूलं धृतिः परा ॥ २२ ॥
जो सत्पुरुषोंका संग करता है, उसे उन्हींके तेज या प्रतापसे कोई ऐसा उपाय प्राप्त हो सकता है, जो इस लोक और परलोकमें भी कल्याण करनेवाला हो। उत्तम धृति (मनकी स्थिरता) ही कल्याणका मूल है ॥ २२ ॥
राजर्षिरधृतिः स्वर्गात् पतितो हि महाभिषः ।
ययातिः क्षीणपुण्योऽपि धृत्या लोकानवाप्तवान् ॥ २३ ॥
राजर्षि महाभिष धृतिमान् न होनेके कारण ही स्वर्गसे नीचे गिरे और राजा ययाति अपना पुण्य क्षीण हो जानेके बाद भी धृतिके ही बलसे उत्तम लोकोंको प्राप्त हुए ॥ २३ ॥
तपस्विनां धर्मवतां विदुषां चोपसेवनात् ।
प्राप्स्यसे विपुलां बुद्धिं तथा श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ २४ ॥
राजन्! तपस्वी, धर्मात्मा एवं विद्वानोंकी सेवा करनेसे तुम्हें विशाल बुद्धि प्राप्त होगी, जिससे तुम कल्याणके भागी हो सकोगे ॥ २४ ॥
स तु स्वभावसम्पन्नस्तच्छ्रुत्वा मुनिभाषितम् ।
विनिवर्त्य मनः कामाद् धर्मे बुद्धिं चकार ह ॥ २५ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! राजकुमार वसुमान् अच्छे स्वभावसे सम्पन्न था। उसने मुनिके उस उपदेशको सुनकर अपने मनको कामनाओंसे हटा लिया और बुद्धिको धर्ममें ही लगा दिया ॥ २५ ॥