महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘उन यज्ञकुशल ब्राह्मणोंने नाभागपुत्र अम्बरीषकी सराहना करते हुए कहा था कि ‘ऐसा यज्ञ न तो पहलेके राजाओंने किया है और न भविष्यमें होनेवाले ही करेंगे’ ।।
शतं राजसहस्राणि शतं राजशतानि च ।
सर्वेऽश्वमेधैरीजानास्तेऽन्वयुर्दक्षिणायनम् ।। १०३ ।।
‘उनके यज्ञमें एक लाख दस हजार राजा सेवाकार्य करते थे। वे सभी अश्वमेधयज्ञका फल पाकर दक्षिणायनके पश्चात् आनेवाले उत्तरायणमार्गसे ब्रह्मलोकमें चले गये थे ।।
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। १०४ ।।
‘सृंजय! राजा अम्बरीष चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी जीवित न रह सके तो दूसरेके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ।। १०४ ।।
शशबिन्दुं चैत्ररथं मृतं शुश्रुम सृंजय ।
यस्य भार्यासहस्राणां शतमासीन्महात्मनः ।। १०५ ।।
सहस्रं तु सहस्राणां यस्यासन् शाशबिन्दवाः ।
‘सृंजय! हम सुनते हैं कि चित्ररथके पुत्र शशबिन्दु भी मृत्युसे अपनी रक्षा न कर सके। उन महामना नरेशके एक लाख रानियाँ थीं और उनके गर्भसे राजाके दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए थे ।। १०५ १/२ ।।
हिरण्यकवचाः सर्वे सर्वे चोत्तमधन्विनः ।। १०६ ।।
शतं कन्या राजपुत्रमेकैकं पृथगन्वयुः ।
कन्यां कन्यां शतं नागा नागं नागं शतं रथाः ।। १०७ ।।
‘वे सभी राजकुमार सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले और उत्तम धनुर्धर थे। एक-एक राजकुमारको अलग-अलग सौ-सौ कन्याएँ ब्याही गयी थीं। प्रत्येक कन्याके साथ सौ-सौ हाथी प्राप्त हुए थे। हर एक हाथीके पीछे सौ-सौ रथ मिले थे ।। १०६-१०७ ।।
रथे रथे शतं चाश्वा देशजा हेममालिनः ।
अश्वे अश्वे शतं गावो गवां तद्वदजाविकम् ।। १०८ ।।
‘प्रत्येक रथके साथ सुवर्णमालाधारी सौ-सौ देशीय घोड़े थे। हर एक अश्वके साथ सौ गायें और एक-एक गायके साथ सौ-सौ भेड़-बकरियाँ प्राप्त हुई थीं ।। १०८ ।।
एतद् धनमपर्यन्तमश्वमेधे महामखे ।
शशबिन्दुर्महाराज ब्राह्मणेभ्यः समर्पयत् ।। १०९ ।।
‘महाराज! राजा शशबिन्दुने यह अनन्त धनराशि अश्वमेध नामक महायज्ञमें ब्राह्मणोंको दान कर दी थी ।।
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ११० ।।