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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1849, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1849

बिना यज्ञ कहनेयोग्य नहीं रहा। इसका आयोजन करनेवाले लोग वध और बन्धनकी
दुर्दशामें पड़नेवाले हैं। अहो! कालका कैसा उलट-फेर है ।। ११-१२ ।।

किंनु मोहान्न पश्यन्ति विनाशं पर्युपस्थितम् ।
उपस्थितं महाघोरं न बुध्यन्ति महाध्वरे ॥ १३ ॥
'इस महायज्ञमें अत्यन्त घोर विनाश उपस्थित होनेवाला है; किंतु मोहवश कोई देख
नहीं रहे हैं—समझ नहीं पाते हैं' ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वा स महायोगी पश्यति ध्यानचक्षुषा ।
स पश्यति महादेवं देवीं च वरदां शुभाम् ॥ १४ ॥
नारदं च महात्मानं तस्या देव्याः समीपतः ।
संतोषं परमं लेभे इति निश्चित्य योगवित् ॥ १५ ॥
एकमन्त्रास्तु ते सर्वे येनेशो न निमन्त्रितः ।
ऐसा कहकर महायोगी दधीचिने जब ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें भगवान् शंकर
और मंगलमयी वरदायिनी देवी पार्वतीजीका दर्शन हुआ। उनके पास ही महात्मा नारदजी