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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 171

दुष्यन्त्याददतो भृत्या नित्यं दस्युभयादिव ।
दुर्लभं च धनं प्राप्य भृशं दत्त्वानुतप्यते ॥ २२ ॥
‘अपना वेतन यथासमय पाते हुए भी जब भृत्योंको संतोष नहीं होता, तब वे स्वामीसे अप्रसन्न रहते हैं और वह धनी दुर्लभ धनको पाकर यदि सेवकोंको अधिक देता है तो उसे उतना ही अधिक संताप होता है, जितना चोर-डाकुओंसे भयके कारण हुआ करता है ॥ २२ ॥

अधनः कस्य किं वाच्यो विमुक्तः सर्वशः सुखी ।
देवस्वमुपगृह्यैव धनेन न सुखी भवेत् ॥ २३ ॥
‘निर्धनको कौन क्या कह सकता है? वह सब प्रकारके भयसे मुक्त हो सुखी रहता है। देवताओंकी सम्पत्ति लेकर भी कोई धनसे सुखी नहीं हो सकता ॥ २३ ॥

अत्र गाथां यज्ञगीतां कीर्तयन्ति पुराविदः ।
त्रयीमुपाश्रितां लोके यज्ञसंस्तरकारिकाम् ॥ २४ ॥
‘इस विषयमें यज्ञमें ऋत्विजोंद्वारा गायी हुई एक गाथा है जो तीनों वेदोंके आश्रित है, वह गाथा लोकमें यज्ञकी प्रतिष्ठा करनेवाली है। पुरानी बातोंको जाननेवाले लोग उसे ऐसे अवसरोंपर दुहराया करते हैं ॥ २४ ॥

यज्ञाय सृष्टानि धनानि धात्रा
यज्ञाय सृष्टः पुरुषो रक्षिता च ।
तस्मात् सर्वं यज्ञ एवोपयोज्यं
धनं न कामाय हितं प्रशस्तम् ॥ २५ ॥
‘विधाताने यज्ञके लिये ही धनकी सृष्टि की है और यज्ञके लिये उसकी रक्षा करनेके निमित्त पुरुषको उत्पन्न किया है; इसलिये सारे धनका यज्ञ-कार्यमें ही उपयोग करना चाहिये। भोगके लिये धनका उपयोग न तो हितकर है और न उत्तम ही ॥ २५ ॥

एतत् स्वार्थे च कौन्तेय धनं धनवतां वर ।
धाता ददाति मर्त्येभ्यो यज्ञार्थमिति विद्धि तत् ॥ २६ ॥
‘धनवानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार धनंजय! विधाता मनुष्योंको स्वार्थके लिये भी जो धन देते हैं उसे यज्ञार्थ ही समझो ॥ २६ ॥

तस्माद् बुद्ध्यन्ति पुरुषा न हि तत् कस्यचिद् ध्रुवम् ।
श्रद्दधानस्ततो लोको दद्याच्चैव यजेत च ॥ २७ ॥
‘इसीलिये बुद्धिमान् पुरुष यह समझते हैं कि धन कभी किसी एकके पास स्थिर होकर नहीं रहता; अतः श्रद्धालु मनुष्यको चाहिये कि वह उस धनका दान करे और उसे यज्ञमें लगावे ॥ २७ ॥

लब्धस्य त्यागमित्याहुर्न भोगं न च संचयम् ।
तस्य किं संचयेनार्थः कार्ये ज्यायसि तिष्ठति ॥ २८ ॥