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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1461, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1461

तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ।। ७ ।।
'वही यथासमय आलस्य छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाशित होता, वही अस्त होता और वही वर्षा करता था। ब्रह्मन्! उस बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ। आप मुझे राजा बलिका पता बताइये ।। ६-७ ।।

ब्रह्मोवाच
नैतत् ते साधु मघवन् यदेनमनुपृच्छसि ।
पृष्टस्तु नानृतं ब्रूयात् तस्माद् वक्ष्यामि ते बलिम् ।। ८ ।।
**ब्रह्माजीने कहा—**मघवन्! यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है कि तुम मुझसे बलिका पता पूछ रहे हो। पूछनेपर झूठ नहीं बोलना चाहिये, इसलिये मैं तुमसे बलिका पता बता रहा हूँ ।। ८ ।।

उष्ट्रेषु यदि वा गोषु खरेष्वश्वेषु वा पुनः ।
वरिष्ठो भविता जन्तुः शून्यागारे शचीपते ।। ९ ।।
शचीपते! किसी शून्य घरमें ऊँट, गौ, गर्दभ अथवा अश्वजातिके पशुओंमें जो श्रेष्ठ जीव उपलब्ध हो, उसे बलि समझो ।। ९ ।।

शक्र उवाच
यदि स्म बलिना ब्रह्मन् शून्यागारे समेयिवान् ।
हन्यामेनं न वा हन्यां तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ।। १० ।।
**इन्द्रने पूछा—**ब्रह्मन्! यदि किसी एकान्त गृहमें राजा बलिसे मेरी भेंट हो जाय तो मैं उन्हें मार डालूँ या न मारूँ, यह मुझे बतावें ।। १० ।।

ब्रह्मोवाच
मा स्म शक्र बलिं हिंसीर्न बलिर्वधमर्हति ।
न्यायस्तु शक्र प्रष्टव्यस्त्वया वासव काम्यया ।। ११ ।।
**ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! तुम बलिका वध न करना, बलि वधके योग्य नहीं है। वासव! तुम उनसे इच्छानुसार न्यायोचित व्यवहारके विषयमें प्रश्न कर सकते हो ।। ११ ।।

भीष्म उवाच
एवमुक्तो भगवता महेन्द्रः पृथिवीं तदा ।
चचारैरावतस्कन्धमधिरुह्य श्रिया वृतः ।। १२ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् ब्रह्माजीके इस प्रकार आदेश देनेपर देवराज इन्द्र ऐरावतकी पीठपर सवार हो राजलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे ।। १२ ।।

ततो ददर्श स बलिं खरवेषेण संवृतम् ।