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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1432, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1432

निगल जाते हैं, उसी प्रकार बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको सताने लगते हैं) ।।
तदनिष्टं हरेर्भद्रे धातुरस्य महात्मनः ।
परमेश्वरसंक्रीडा लोकसृष्टिरियं शुभे ।।
भद्रे! सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करनेवाले परमात्मा श्रीहरिको यह अभीष्ट नहीं है। शुभे! जगत्की यह सारी सृष्टि परमेश्वरकी क्रीड़ा है ।।
यावत् पांसव उद्दिष्टास्तावत्योऽस्य विभूतयः ।
तावत्यश्चैव मायास्तु तावत्योऽस्याश्च शक्तयः ।।
धूलिके जितने कण हैं, उतनी ही परमेश्वर श्रीहरिकी विभूतियाँ हैं, उतनी ही उनकी मायाएँ हैं और उतनी ही उन मायाओंकी शक्तियाँ भी हैं ।।
एवं सुगह्वरे मुक्तो यत्र मे तद्भावाभवम् ।
छित्त्वा ज्ञानासिना गच्छेत् स विद्वान् स च मे प्रियः ।।
सोऽहमेव न संदेहः प्रतिज्ञा इति तस्य वै ।।
स्वयं भगवान् नारायणका कथन है कि 'जो मुक्तिलाभके लिये उद्योगशील पुरुष अत्यन्त गहन गुफामें रहकर ज्ञानरूप खड्गके द्वारा जन्म-मृत्युके बन्धनको काटकर मेरे धामको चला जाता है, वही विद्वान् है और वही मुझे प्रिय है। वह योगी पुरुष मैं ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है' यह भगवान्‌की प्रतिज्ञा है ।।
ये मूढास्ते दुरात्मानो धर्मसंकरकारकाः ।
मर्यादाभेदका नीचा नरके यान्ति जन्तवः ।
आसुरीं योनिमापन्ना इति देवानुशासनम् ।।
'जो मूढ़, दुरात्मा, धर्मसंकरता उत्पन्न करनेवाले, मर्यादाभेदक और नीच मनुष्य हैं, वे नरकमें गिरते हैं और आसुरी योनिमें पड़ते हैं, यह भी उन्हीं भगवान्‌का अनुशासन है' ।।
भगवत्या तथा लोके रक्षितव्यं न संशयः ।
मर्यादालोकरक्षार्थमेवमस्मि तथा स्थितः ।।
देवि! तुम्हें भी जगत्‌की रक्षाके लिये लोकमर्यादाका पालन करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। मैं भी इसी भावसे लोक-मर्यादाकी रक्षामें स्थित हूँ ।।

सुवर्चलोवाच

शब्दः कोऽत्र इति ख्यातस्तथार्थश्च महामुने ।
आकृत्यापि तयोर्ब्रूहि लक्षणेन पृथक् पृथक् ।।
**सुवर्चलाने पूछा—**महामुने! यहाँ शब्द किसे कहा गया है और अर्थ भी क्या है? आप उन दोनोंकी आकृति और लक्षणका निर्देश करते हुए उनका पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये ।।

श्वेतकेतुरुवाच

व्यत्ययेन च वर्णानां परिवादकृतो हि यः ।