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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1359, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1359

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अन्तर्भूमिविक्रीडनं नाम
नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भूमिके भीतर भगवान्
वाराहकी क्रीड़ानामक दो सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२२ १/३ श्लोक हैं)


* इस श्लोकमें वर्णित भावके अनुसार सनातन शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—नादनेन सहितः सनादनः। दकारस्थाने तकारो छान्दसः। जो नादके साथ हो, वह ‘सनादन’ कहलाता है। सनादनके दकारके स्थानमें तकार हो जानेसे ‘सनातन’ बनता है।
१. आश्रावय, २. अस्तु श्रौषट्, ३. यज, ४. ये यजामहे, ५. वषट्।