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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1323, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1323

परं नैवाभिकांक्षन्ति निर्गुणत्वाद् गुणार्थिनः ।। २२ ।।

संसारी मनुष्य इस संसारमें जिन-जिन विषयोंको देखते हैं, उन्हींको पाना चाहते हैं।

सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हें पानेके लिये उनके मनमें इच्छा नहीं होती है; क्योंकि वे

गुणार्थी (विषयाभिलाषी) होते हैं और परमात्मा निर्गुण (गुणातीत) हैं ।। २२ ।।

गुणैर्यस्त्ववरैर्युक्तः कथं विद्यात् परान् गुणान् ।

अनुमानाद्धि गन्तव्यं गुणैरवयवैः परम् ।। २३ ।।

भला, जो इन तुच्छ विषयोंमें फँसा हुआ है, वह परमदिव्य गुणोंको कैसे जान सकता

है? जैसे धूमसे अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार नित्यत्व आदि स्वरूपभूत दिव्य

गुणोंद्वारा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका दिग्दर्शन हो सकता है ।। २३ ।।

सूक्ष्मेण मनसा विद्मो वाचा वक्तुं न शक्नुमः ।

मनो हि मनसा ग्राह्यं दर्शनेन च दर्शनम् ।। २४ ।।

हम ध्यानद्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मनसे परमात्माके स्वरूपका अनुभव तो कर सकते

हैं, किंतु वाणीद्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते; क्योंकि मनके द्वारा ही मानसिक

विषयका ग्रहण हो सकता है और ज्ञानके द्वारा ही ज्ञेयको जाना जा सकता है ।। २४ ।।

ज्ञानेन निर्मलीकृत्य बुद्धिं बुद्ध्या मनस्तथा ।

मनसा चेन्द्रियग्राममक्षरं प्रतिपद्यते ।। २५ ।।

इसलिये ज्ञानके द्वारा बुद्धिको, बुद्धिके द्वारा मनको तथा मनके द्वारा इन्द्रिय-

समुदायको निर्मल एवं शुद्ध करके अविनाशी परमात्माको प्राप्त किया जा सकता है ।।

बुद्धिप्रवीणो मनसा समृद्धो

निराशिषं निर्गुणमभ्युपैति ।

परं त्यजन्तीह विलोड्यमाना

हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम् ।। २६ ।।

बुद्धिमें प्रवीण अर्थात् विशुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे सम्पन्न एवं मानसिक बलसे युक्त हुआ

पुरुष, समस्त इच्छासे अतीत निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है। जैसे वायु काठमें रहनेवाले

अदृश्य अग्निको बिना प्रज्वलित किये ही छोड़ देता है, वैसे ही कामनाओंसे विकल हुए

पुरुष भी अपने शरीरके भीतर स्थित परमात्माका त्याग कर देते हैं अर्थात् उसे जानने और

पानेकी चेष्टा नहीं करते ।।

गुणादाने विप्रयोगे च तेषां

मनः सदा बुद्धिपरावराभ्याम् ।

अनेनैव विधिना सम्प्रवृत्तो

गुणापाये ब्रह्म शरीरमेति ।। २७ ।।

जब साधक साधनरूप गुणोंको धारण कर लेता है और उन सांसारिक पदार्थोंसे मनको

हटा लेता है, तब उसका मन बुद्धिजन्य अच्छे-बुरे भावोंसे रहित होकर निरन्तर निर्मल रहता