महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1242, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुद्धि त्वचासे स्पर्शका बोध प्राप्त करती है। इस प्रकार वह बारंबार विकारको प्राप्त होती रहती है। वह जिस करणके द्वारा जिसका अनुभव करना चाहती है, मन उसीका रूप धारण कर लेता है ॥ २० ॥
अधिष्ठानानि बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा ।
इन्द्रियाणीति यान्याहुस्तान्यदृश्योऽधितिष्ठति ॥ २१ ॥
भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण करनेके लिये जो बुद्धिके पाँच अधिष्ठान हैं, उन्हींको पाँच इन्द्रियाँ कहते हैं। अदृश्य जीवात्मा उन सबका अधिष्ठाता (प्रेरक) है ॥ २१ ॥
पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ।
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति ॥ २२ ॥
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते ।
जीवात्माके आश्रित रहकर बुद्धि (सुख, दुःख और मोह) तीन भावोंमें स्थित होती है। वह कभी तो प्रसन्नताका अनुभव करती है, कभी शोकमें डूबी रहती है और कभी सुख और दुःख दोनोंके अनुभवसे रहित मोहाच्छन्न हो जाती है ॥ २२ १/२ ॥
एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ॥ २३ ॥
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते ।
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ॥ २४ ॥
इस प्रकार वह मनुष्योंके मनके भीतर तीन भावोंमें अवस्थित है, यह भावात्मिका बुद्धि (समाधि-अवस्थामें) सुख, दुःख और मोह—इन तीनों भावोंको लाँघ जाती है। ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे संयुक्त हो अपनी विशाल तटभूमिको भी कभी-कभी लाँघ जाता है ॥ २३-२४ ॥
अतिभावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते ।
प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावमनुवर्तते ॥ २५ ॥
उपर्युक्त भावोंको लाँघ जानेपर भी बुद्धि भावात्मक मनमें सूक्ष्मरूपसे स्थित रहती है। तत्पश्चात् समाधिसे उत्थानके समय प्रवृत्त्यात्मक रजोगुण बुद्धिभावका अनुसरण करता है ॥ २५ ॥
इन्द्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा तदा ।
ततः सत्त्वं तमोभावः प्रीतियोगात् प्रवर्तते ॥ २६ ॥
उस समय रजोगुणसे युक्त हुई बुद्धि सारी इन्द्रियोंको प्रवृत्तिमें लगा देती है। तदनन्तर विषयोंके सम्बन्धसे प्रीतिरूप सत्त्वगुण प्रकट होता है। उसके बाद पुरुषके आसक्ति आदि दोषोंसे तमोमय भावका उदय होता है ॥ २६ ॥
प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमो मोहस्तु ते त्रयः ।
ये ये च भावा लोकेऽस्मिन् सर्वेष्वेतेषु वै त्रिषु ॥ २७ ॥