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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1209, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1209

तुम क्षेत्रज्ञको आत्मा ही समझो। वह सर्वलोक-हितकारी है। इस शरीरमें रहकर भी वह कमल-पत्रपर पड़े हुए जलबिन्दु की तरह वास्तवमें इससे पृथक् ही है ॥ २४ ॥
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् ।
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ॥ २५ ॥
उस क्षेत्रज्ञको सदा आत्मा ही जानो। वह सम्पूर्ण जगत्का हितस्वरूप है। तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—इन तीनों प्राकृत गुणोंको प्रकृति-स्थित होनेके कारण जीवके गुण समझो ॥ २५ ॥
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति
स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् ।
अतः परं क्षेत्रविदो वदन्ति
प्रावर्तयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २६ ॥
चेतन जीवके सम्बन्धसे उपर्युक्त जीवके गुणोंको चेतनायुक्त कहते हैं*। वह जीव स्वयं चेष्टा करता है और सबसे चेष्टा करवाता है। शरीरके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष इस क्षेत्रज्ञ आत्मासे उस परमात्माको श्रेष्ठ बताते हैं, जिसने भूःभुवः आदि सातों लोकोंको उत्पन्न किया है ॥ २६ ॥
न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे
मिथ्यैतदाहुर्मृत इत्यबुद्धाः ।
जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति
दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २७ ॥
देहका नाश होनेपर भी जीवका नाश नहीं होता। जो जीवकी मृत्यु बताते हैं, वे अज्ञानी हैं और उनका वह कथन मिथ्या है। जीव तो इस मृत देहका त्याग करके दूसरे शरीरमें चला जाता है। शरीरके पाँच तत्त्वोंका अलग-अलग हो जाना ही शरीरका नाश है ॥ २७ ॥
एवं सर्वेषु भूतेषु गूढश्चरति संवृतः ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥ २८ ॥
इस प्रकार आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर उनकी हृदयगुफामें गूढ़भावसे छिपा रहता है। वह तत्त्वदर्शी पुरुषोंद्वारा तीक्ष्ण एवं सूक्ष्म बुद्धिसे साक्षात् किया जाता है ॥
तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं बुधः ।
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ २९ ॥
जो विद्वान् परिमित आहार करके रातके पहले और पिछले पहरमें सदा ध्यानयोगका अभ्यास करता है, वह अन्तःकरण शुद्ध होनेपर अपने हृदयमें ही उस आत्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ २९ ॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् ।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ ३० ॥