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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1093, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1093

विज्ञातुकामस्य ममेह वाक्य-

मुक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे ।

इदं त्ववश्यं गदतो ममापि

वाक्यं निबोधध्वमनन्यभावाः ॥ ४३ ॥

युधिष्ठिर बोले—बन्धुओ! इसमें संदेह नहीं कि आपलोग धर्मशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर

विचार करके एक निश्चयपर पहुँच चुके हैं। आपलोगोंको प्रमाणोंका भी ज्ञान प्राप्त है। मैं

सबके विचार जानना चाहता था, इसलिये मेरे सामने यहाँ आपलोगोंने जो अपना-अपना

निश्चित सिद्धान्त बताया है, वह सब मैंने ध्यानसे सुना है। अब आप, मैं जो कुछ कह रहा हूँ,

मेरी उस बातको भी अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये ॥ ४३ ॥

यो वै न पापे निरतो न पुण्ये

नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे ।

विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो

विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ॥ ४४ ॥

जो न पापमें लगा हो और न पुण्यमें, न तो अर्थोपार्जनमें तत्पर हो न धर्ममें, न काममें

ही। वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित मनुष्य दुःख और सुखको देनेवाली सिद्धियोंसे सदाके

लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टीके ढेले और सोनेमें उसका समान भाव हो जाता

है ॥ ४४ ॥

भूतानि जातिस्मरणात्मकानि

जराविकारैश्च समन्वितानि ।

भूयश्च तैस्तैः प्रतिबोधितानि

मोक्षं प्रशंसन्ति न तं च विद्मः ॥ ४५ ॥

जो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले तथा वृद्धावस्थाके विकारसे युक्त हैं, वे

मनुष्य नाना प्रकारके सांसारिक दुःखोंके उपभोगसे निरन्तर पीड़ित हो मुक्तिकी ही प्रशंसा

करते हैं, परंतु हमलोग उस मोक्षके विषयमें जानते ही नहीं ॥ ४५ ॥

स्नेहेन युक्तस्य न चास्ति मुक्ति-

रिति स्वयम्भूर्भगवानुवाच ।

बुधाश्च निर्वाणपरा भवन्ति

तस्मान्न कुर्यात् प्रियमप्रियं च ॥ ४६ ॥

स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीका कथन है कि जिसके मनमें आसक्ति है, उसकी कभी

मुक्ति नहीं होती। आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्षको प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुषको

चाहिये कि वह किसीका प्रिय अथवा अप्रिय न करे ॥ ४६ ॥

एतत् प्रधानं च न कामकारो

यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ।