सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1088, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1088

धनवान् मनुष्य धनके द्वारा उत्तम धर्मका पालन और अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुर्लभ कामनाओंकी प्राप्ति कर सकता है ॥ १३ ॥
अर्थस्यावयवावेतौ धर्मकामाविति श्रुतिः ।
अर्थसिद्ध्या विनिर्वृत्तावुभावेतौ भविष्यतः ॥ १४ ॥
श्रुतिका कथन है कि धर्म और काम अर्थके ही दो अवयव हैं। अर्थकी सिद्धिसे उन दोनोंकी भी सिद्धि हो जायगी ॥ १४ ॥
तद्गतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरयोनयः ।
ब्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ॥ १५ ॥
जैसे सब प्राणी सदा ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार उत्तम जातिके मनुष्य भी सदा धनवान् पुरुषकी उपासना किया करते हैं ॥ १५ ॥
जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रियाः ।
मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ॥ १६ ॥
जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले जितेन्द्रिय संयतचित्त शरीरमें पंक धारण किये मुण्डितमस्तक नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थकी अभिलाषा रखकर पृथक्-पृथक् निवास करते हैं ॥ १६ ॥
काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला ह्रीनिषेविणः ।
विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ॥ १७ ॥
अर्थार्थिनः सन्ति केचिदपरे स्वर्गकांक्षिणः ।
कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वं स्वं धर्ममनुष्ठिताः ॥ १८ ॥
सब प्रकारके संग्रहसे रहित, संकोचशील, शान्त, गेरुआ वस्त्रधारी, दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये विद्वान् पुरुष भी धनकी अभिलाषा करते देखे गये हैं। कुछ दूसरे प्रकारके ऐसे लोग हैं जो स्वर्ग पानेकी इच्छा रखते हैं; और कुलपरम्परागत नियमोंका पालन करते हुए अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान कर रहे हैं; किंतु वे भी धनकी इच्छा रखते हैं ॥ १७-१८ ॥
आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे ।
अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥ १९ ॥
दूसरे बहुत-से आस्तिक-नास्तिक संयम नियम-परायण पुरुष हैं जो अर्थके इच्छुक होते हैं। अर्थकी प्रधानताको न जानना तमोमय अज्ञान है। अर्थकी प्रधानताका ज्ञान प्रकाशमय है ॥ १९ ॥
भृत्यान् भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान् ।
एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् ।
अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयोः ॥ २० ॥