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सर्वकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1013, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1013

अधर्ममनृतं चैव दूरात् प्राज्ञो विवर्जयेत् ।
बुद्धिमान् पुरुषको अप्रिय आचरण, कठोर वचन दूसरोंके साथ द्रोह, परायी स्त्री, अधर्म और असत्य-भाषणका दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये ।। ७९ १/२ ।।
धर्मं सत्यं श्रुतं न्याय्यं महतीं प्राणिनां दयाम् ।। ८० ।।
अजिह्मत्वमशाठ्यं च यत्नतः परिमार्गत ।
तुम सब लोग धर्म, सत्य, शास्त्रज्ञान, न्यायपूर्ण बर्ताव समस्त प्राणियोंपर बड़ी भारी दया, कुटिलताका अभाव तथा शठताका त्याग—इन्हीं सद्गुणोंका यत्नपूर्वक अनुसरण करे ।। ८० १/२ ।।
मातरं पितरं वापि बान्धवान् सुहृदस्तथा ।। ८१ ।।
जीवतो ये न पश्यन्ति तेषां धर्मविपर्ययः ।
जो लोग जीवित माता-पिता, सुहृदों और भाई-बन्धुओंकी देखभाल नहीं करते हैं, उनके धर्मकी हानि होती है ।। ८१ १/२ ।।
यो न पश्यति चक्षुर्भ्यां नेङ्गते च कथञ्चन ।। ८२ ।।
तस्य निष्ठावसानान्ते रुदन्तः किं करिष्यथ ।
जो न आँखोंसे देखता है, न शरीरसे कोई चेष्टा ही करता है, उसके जीवनका अन्त हो जानेपर अब तुमलोग रोकर क्या करोगे ।। ८२ १/२ ।।
इत्युक्तास्ते सुतं त्यक्त्वा भूमौ शोकपरिप्लुताः ।
दह्यमानाः सुतस्नेहात् प्रययुर्बान्धवा गृहम् ।। ८३ ।।
गीधके ऐसा कहनेपर वे शोकमें डूबे हुए भाई-बन्धु अपने उस पुत्रको धरतीपर सुलाकर उसके स्नेहसे दग्ध होते हुए अपने घरकी ओर लौटे ।। ८३ ।।

जम्बुक उवाच

दारुणो मर्त्यलोकोऽयं सर्वप्राणिविनाशनः ।
इष्टबन्धुवियोगश्च तथेहाल्पं च जीवितम् ।। ८४ ।।
तब सियारने कहा—यह मर्त्यलोक अत्यन्त दुःखद है। यहाँ समस्त प्राणियोंका नाश ही होता है। प्रिय बन्धुजनोंके वियोगका कष्ट भी प्राप्त होता रहता है। यहाँका जीवन बहुत थोड़ा है ।। ८४ ।।
बह्वलीकमसत्यं चाप्यतिवादाप्रियंवदम् ।
इमं प्रेक्ष्य पुनर्भावं दुःखशोकविवर्धनम् ।। ८५ ।।
न मे मानुषलोकोऽयं मुहूर्तमपि रोचते ।