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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 975, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 975

तत्र त्वं दुर्मते योग्यो न युद्धेषु कदाचन ॥ ९६ ॥
‘दुर्बुद्धि पाण्डव! जहाँ अनेक प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ रखी हों, तू वहीं रहनेके योग्य है! युद्धोंमें तुझे कभी नहीं आना चाहिये ॥ ९६ ॥
मूलपुष्पफलाहारो व्रतेषु नियमेषु च ।
उचितस्त्वं वने भीम न त्वं युद्धविशारदः ॥ ९७ ॥
‘भीम! वनमें रहकर तू फल-मूल और फूल खाकर व्रत एवं नियम आदि पालन करनेके योग्य है। युद्धकौशल तुझमें नाममात्रको भी नहीं है ॥ ९७ ॥
क्व युद्धं क्व मुनित्वं च वनं गच्छ वृकोदर ।
न त्वं युद्धोचितस्तात वनवासरतिर्भवान् ॥ ९८ ॥
‘वृकोदर! कहाँ युद्ध और कहाँ मुनिवृत्ति। जा, जा, वनमें चला जा। तात! तुझमें युद्धकी योग्यता नहीं है। तू तो वनवासका ही प्रेमी है ॥ ९८ ॥
(सूदं त्वामहमाजाने मात्स्ये प्रेष्यककारकम् ।)
सूदान् भृत्यजनान् दासांस्त्वं गृहे त्वरयन् भृशम् ।
योग्यस्ताडयितुं क्रोधाद् भोजनार्थं वृकोदर ॥ ९९ ॥
‘मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ। तू मत्स्यराज विराट्का नौकर एक रसोइया रहा है। वृकोदर! तू तो घरमें रसोइयों, भृत्यजनों तथा दासोंको बहुत जल्दी भोजन तैयार करनेके लिये प्रेरणा देते हुए क्रोधसे उन्हें डाँटने और मारने-पीटनेकी योग्यता रखता है ॥ ९९ ॥
मुनिर्भूत्वाथवा भीम फलान्यादत्स्व दुर्मते ।
वनाय व्रज कौन्तेय न त्वं युद्धविशारदः ॥ १०० ॥
‘दुर्मति कुन्तीकुमार भीम! अथवा तू मुनि होकर वनमें चला जा। वहाँ इधर-उधरसे फल ले आ और खा। तू युद्धमें निपुण नहीं है ॥ १०० ॥
फलमूलाशने शक्तस्त्वं तथातिथिपूजने ।
न त्वां शस्त्रसमुद्योगे योग्यं मन्ये वृकोदर ॥ १०१ ॥
‘वृकोदर! तू फल-मूल खाने और अतिथिसत्कार करनेमें समर्थ है। मैं तुझे हथियार उठानेके योग्य नहीं मानता’ ॥ १०१ ॥
कौमारे यानि वृत्तानि विप्रियाणि विशाम्पते ।
तानि सर्वाणि चाप्येव रूक्षाण्यश्रावयद् भृशम् ॥ १०२ ॥
प्रजापालक नरेश! कर्णने बाल्यावस्थामें जो अप्रिय वृत्तान्त घटित हुए थे, उन सबका उल्लेख करते हुए बहुत-सी रूखी बातें सुनायीं ॥ १०२ ॥
अथैनं तत्र संलीनमस्पृशद् धनुषा पुनः ।
प्रहसंश्च पुनर्वाक्यं भीममाह वृषस्तदा ॥ १०३ ॥
तत्पश्चात् वहाँ छिपे हुए भीमसेनका कर्णने पुनः धनुषसे स्पर्श किया और उस समय उनका उपहास करते हुए फिर कहा— ॥ १०३ ॥