महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रोणने युद्धमें बहुत-से दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करके क्षणभरमें पाण्डवों तथा सृंजयोंको पीड़ित कर दिया ।।
ते वध्यमाना द्रोणेन वासवेनेव दानवाः ।। ४७ ।।
पञ्चालाः समकम्पन्त धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
जैसे इन्द्र दानवोंको पीड़ा देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यसे पीड़ित हो धृष्टद्युम्न आदि पांचाल योद्धा भयसे काँपने लगे ।। ४७ १/२ ।।
ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो याज्ञसेनिर्महारथः ।। ४८ ।।
अभिनच्छरवर्षेण द्रोणानीकमनेकधा ।
तब दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता यज्ञसेनकुमार शूरवीर महारथी धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंकी वर्षासे द्रोणाचार्यकी सेनाको बारंबार घायल किया ।। ४८ १/२ ।।
द्रोणस्य शरवर्षाणि शरवर्षेण पार्षतः ।। ४९ ।।
संनिवार्य ततः सर्वान् कुरूनप्यवधीद् बली ।
बलवान् द्रुपदपुत्रने अपने बाणोंकी वर्षासे द्रोणाचार्यकी बाणवृष्टिको रोककर समस्त कौरव सैनिकोंको मारना आरम्भ किया ।। ४९ १/२ ।।
संयम्य तु ततो द्रोणः समवस्थाप्य चाहवे ।। ५० ।।
स्वमनीकं महेष्वासः पार्षतं समुपाद्रवत् ।
तब महाधनुर्धर द्रोणाचार्यने अपनी सेनाको काबूमें करके उसे युद्धस्थलमें स्थिरभावसे खड़ा कर दिया और द्रुपदकुमारपर धावा किया ।। ५० १/२ ।।
स बाणवर्षं सुमहदसृजत् पार्षतं प्रति ।। ५१ ।।
मघवान् समभिक्रुद्धः सहसा दानवानिव ।
जैसे क्रोधमें भरे हुए इन्द्र सहसा दानवोंपर बाणोंकी बौछार करते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नपर बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ५१ १/२ ।।
ते कम्प्यमाना द्रोणेन बाणैः पाण्डवसृञ्जयाः ।। ५२ ।।
पुनः पुनरभज्यन्त सिंहेनेवेतरे मृगाः ।
जैसे सिंह दूसरे मृगोंको भगा देता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके बाणोंसे विकम्पित हुए पाण्डव तथा सृंजय बारंबार युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ।। ५२ १/२ ।।
तथा पर्यचरद् द्रोणः पाण्डवानां बले बली ।
अलातचक्रवद् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ।। ५३ ।।
राजन्! बलवान् द्रोणाचार्य पाण्डवोंकी सेनामें अलातचक्रकी भाँति चारों ओर चक्कर लगाने लगे। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ।। ५३ ।।
खचरनगरकल्पं कल्पितं शास्त्रदृष्ट्या
चलदनिलपताकं ह्लादनं वल्गिताश्वम् ।