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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 829, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 829

डालो ॥ ३१ ॥
तथैव कुरवः सर्वे नाश्मयुद्धविशारदाः ।
अभिद्रवत मा भैष्ट न वः प्राप्स्यति सात्यकिः ॥ ३२ ॥
'इसी प्रकार समस्त कौरव भी प्रस्तरयुद्धमें प्रवीण नहीं हैं। अतः तुम डरो मत। आक्रमण करो। सात्यकि तुम्हें नहीं पा सकता' ॥ ३२ ॥
ते पर्वतीया राजानः सर्वे पाषाणयोधिनः ।
अभ्यद्रवन्त शैनेयं राजानमिव मन्त्रिणः ॥ ३३ ॥
जैसे मन्त्री राजाके पास जाते हैं, उसी प्रकार वे पाषाणयोधी समस्त पर्वतीय नरेश सात्यकिकी ओर दौड़े ॥ ३३ ॥
ततो गजशिरःप्रख्यैरुपलैः शैलवासिनः ।
उद्यतैर्युयुधानस्य पुरतस्तस्थुराहवे ॥ ३४ ॥
वे पर्वतनिवासी योद्धा हाथीके मस्तकके समान बड़े-बड़े प्रस्तर हाथमें लेकर समरांगणमें युयुधानके सामने युद्धके लिये तैयार होकर खड़े हो गये ॥ ३४ ॥
क्षेपणीयैस्तथाप्यन्ये सात्वतस्य वधैषिणः ।
चोदितास्तव पुत्रेण सर्वतो रुरुधुर्दिशः ॥ ३५ ॥
आपके पुत्र दुःशासनसे प्रेरित होकर सात्यकिके वधकी इच्छा रखनेवाले अन्य बहुतेरे सैनिकोंने भी क्षेपणीयास्त्र उठाकर सब ओरसे सात्यकिकी सम्पूर्ण दिशाओंको अवरुद्ध कर लिया ॥ ३५ ॥
तेषामापततामेव शिलायुद्धं चिकीर्षताम् ।
सात्यकिः प्रतिसंधाय निशितान् प्राहिणोच्छरान् ॥ ३६ ॥
प्रस्तरयुद्धकी इच्छा रखनेवाले उन योद्धाओंके आक्रमण करते ही सात्यकिने तेज किये हुए बाणोंका संधान करके उन्हें उनपर चलाया ॥ ३६ ॥
तामश्मवृष्टिं तुमुलां पर्वतीयैः समीरिताम् ।
चिच्छेदोरगसंकाशैर्नाराचैः शिनिपुङ्गवः ॥ ३७ ॥
पर्वतीय सैनिकोंद्वारा की हुई उस भयंकर पाषाणवर्षाको शिनिप्रवर सात्यकिने अपने सर्पतुल्य नाराचोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ ३७ ॥
तैरश्मचूर्णैर्दीप्यद्भिः खद्योतानामिव व्रजैः ।
प्रायः सैन्यान्यहन्यन्त हाहाभूतानि मारिष ॥ ३८ ॥
माननीय नरेश! जुगनुओंकी जमातोंके समान उद्भासित होनेवाले उन प्रस्तरचूर्णोंसे प्रायः सारी सेनाएँ आहत हो हाहाकार करने लगीं ॥ ३८ ॥
ततः पञ्चशतं शूराः समुद्यतमहाशिलाः ।
निकृत्तबाहवो राजन् निपेतुर्धरणीतले ॥ ३९ ॥