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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 732

अभिप्रायं च मे नित्यं न वृथा कर्तुमर्हसि ॥ ४६ ॥
अतः मैं तुमपर जो कार्यभार रख रहा हूँ, उसका तुम्हें निर्वाह करना चाहिये। मेरे मनोरथको सदा सफल बनानेकी ही तुम्हें चेष्टा करनी चाहिये ॥ ४६ ॥
स त्वं भ्रातुर्वयस्यस्य गुरोरपि च संयुगे ।
कुरु कृच्छ्रे सहायार्थमर्जुनस्य नरर्षभ ॥ ४७ ॥
नरश्रेष्ठ! अर्जुन तुम्हारा भाई, मित्र और गुरु है। वह युद्धके मैदानमें संकटमें पड़ा हुआ है। अतः तुम उसकी सहायताके लिये प्रयत्न करो ॥ ४७ ॥
त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभयङ्करः ।
लोके विख्यायसे वीर कर्मभिः सत्यवागिति ॥ ४८ ॥
तुम सत्यव्रती, शूरवीर तथा मित्रोंको अभय देनेवाले हो। वीर! तुम अपने कर्मोंद्वारा संसारमें सत्यवादीके रूपमें विख्यात हो ॥ ४८ ॥
यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् ।
पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥ ४९ ॥
शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ॥ ४९ ॥
श्रुताश्च बहवोऽस्माभी राजानो ये दिवं गताः ।
दत्त्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥ ५० ॥
हमने सुना है कि बहुत-से राजा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक इस समूची पृथ्वीका दान करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ५० ॥
एवं त्वामपि धर्मात्मन् प्रयाचेऽहं कृताञ्जलिः ।
पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो ॥ ५१ ॥
धर्मात्मन्! इसी प्रकार तुमसे भी मैं अर्जुनकी सहायताके लिये हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। प्रभो! ऐसा करनेसे तुम्हें पृथ्वीदानके समान अथवा उससे भी अधिक फल प्राप्त होगा ॥ ५१ ॥
एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभयङ्करः ।
रणे संत्यजति प्राणान् द्वितीयस्त्वं च सात्यके ॥ ५२ ॥
सात्यके! मित्रोंको अभय प्रदान करनेवाले एक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही सदा हमारे लिये युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग करनेके लिये उद्यत रहते हैं और दूसरे तुम ॥ ५२ ॥
विक्रान्तस्य च वीरस्य युद्धे प्रार्थयतो यशः ।
शूर एव सहायः स्यान्नेतरः प्राकृतो जनः ॥ ५३ ॥
युद्धमें सुयश पानेकी इच्छा रखकर पराक्रम करनेवाले वीर पुरुषकी सहायता कोई शूरवीर पुरुष ही कर सकता है। दूसरा कोई निम्न कोटिका मनुष्य उसका सहायक नहीं हो सकता ॥ ५३ ॥