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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 684, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 684

न त्विदं वेद वै कश्चिद् यथा त्वं मधुसूदन ।। १५ ।।
श्रीकृष्ण! आप यह सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें कैसे डाल रहे हैं? केशव! तीनों लोकोंमें जो बात हो चुकी है, जो हो रही है तथा जो कुछ आगे होनेवाली है, वह सब आपको विदित है। मधुसूदन! इसे आप जैसा जानते हैं, वैसा दूसरा कोई नहीं जानता है ।। १४-१५ ।।
एष दुर्योधनः कृष्ण द्रोणेन विहितामिमाम् ।
तिष्ठत्यभीतवत् संख्ये बिभ्रत् कवचधारणाम् ।। १६ ।।
श्रीकृष्ण! द्रोणाचार्यके द्वारा विधिपूर्वक धारण करायी हुई इस कवचधारणाको ग्रहण करके यह दुर्योधन युद्धस्थलमें निर्भय-सा खड़ा है ।। १६ ।।
यत्त्वत्र विहितं कार्यं नैष तद् वेत्ति माधव ।
स्त्रीवदेष बिभर्त्येतां युक्तां कवचधारणाम् ।। १७ ।।
माधव! इसे धारण करनेपर जिस कर्तव्यके पालनका विधान किया गया है, उसे यह नहीं जानता है। जैसे स्त्रियाँ गहने पहन लेती हैं, उसी प्रकार यह दूसरेके द्वारा दी हुई इस कवचधारणाको अपनाये हुए है ।। १७ ।।
पश्य बाह्वोश्च मे वीर्यं धनुषश्च जनार्दन ।
पराजयिष्ये कौरव्यं कवचेनापि रक्षितम् ।। १८ ।।
जनार्दन! अब आप मेरी भुजाओं और धनुषका बल देखिये। मैं कवचसे सुरक्षित होनेपर भी दुर्योधनको पराजित कर दूँगा ।। १८ ।।
इदमङ्गिरसे प्रादाद् देवेशो वर्म भास्वरम् ।
तस्माद् बृहस्पतिः प्राप ततः प्राप पुरंदरः ।। १९ ।।
देवेश्वर! ब्रह्माजीने यह तेजस्वी कवच अंगिराको दिया था। उनसे बृहस्पतिजीने प्राप्त किया था। बृहस्पतिजीसे वह इन्द्रको मिला ।। १९ ।।
पुनर्ददौ सुरपतिर्मह्यं वर्म ससंग्रहम् ।
दैवं यद्यस्य वर्मैतद् ब्रह्मणा वा स्वयं कृतम् ।। २० ।।
नैनं गोप्स्यति दुर्बुद्धिमद्य बाणहतं मया ।
फिर देवराज इन्द्रने विधि एवं रहस्यसहित वह कवच मुझे प्रदान किया। यदि दुर्योधनका यह कवच देवताओंद्वारा निर्मित हो अथवा स्वयं ब्रह्माजीका बनाया हुआ हो तो भी आज मेरे बाणोंद्वारा मारे गये इस दुर्बुद्धि दुर्योधनको यह बचा नहीं सकेगा ।। २० १/२ ।।

संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनो बाणमभिमन्त्र्य व्यकर्षयत् ।। २१ ।।
मानवास्त्रेण मानार्हस्तीक्ष्णावरणभेदिना ।