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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 643

कृतास्त्रा रणदीक्षाभिर्दीक्षिता रणशालिनः ।
रणे जयं प्रार्थयाना भृशं युयुधिरे तदा ॥ १६ ॥
अस्त्रविद्याके ज्ञाता और युद्धमें शोभा पानेवाले वीर रणयज्ञकी दीक्षा लेकर संग्राममें विजय चाहते हुए उस समय बड़े जोरसे युद्ध करने लगे ॥ १६ ॥
असिमार्गान् बहुविधान् विचेरुः सैनिका रणे ।
ऋष्टिभिः शक्तिभिः प्रासैः शूलतोमरपट्टिशैः ॥ १७ ॥
गदाभिः परिघैश्चान्यैरायुधैश्च भुजैरपि ।
अन्योन्यं जघ्निरे क्रुद्धा युद्धरङ्गगता नराः ॥ १८ ॥
समस्त सैनिक उस रणक्षेत्रमें तलवारके बहुत-से पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे। युद्धकी रंगभूमिमें आये हुए मनुष्य परस्पर कुपित हो एक-दूसरेपर ऋष्टि, शक्ति, प्रास, शूल, तोमर, पट्टिश, गदा, परिघ, अन्यान्य आयुध तथा भुजाओंद्वारा चोट पहुँचाते थे ॥ १७-१८ ॥
रथिनो रथिभिः सार्धमश्वारोहाश्च सादिभिः ।
मातङ्गा वरमातङ्गैः पदाताश्च पदातिभिः ॥ १९ ॥
रथी रथियोंके, घुड़सवार घुड़सवारोंके, मतवाले हाथी श्रेष्ठ गजराजोंके और पैदल योद्धा पैदलोंके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १९ ॥
क्षीबा इवान्ये चोन्मत्ता रङ्गेष्विव च वारणाः ।
उच्चक्रुशुरथान्योन्यं जघ्नुरन्योन्यमेव च ॥ २० ॥
रंगस्थलके समान उस रणक्षेत्रमें अन्य बहुत-से मत्त और उन्मत्त हाथी एक-दूसरेको देखकर चिग्घाड़ते और परस्पर आघात-प्रत्याघात करते थे ॥ २० ॥
वर्तमाने तथा युद्धे निर्मर्यादे विशाम्पते ।
धृष्टद्युम्नो हयानश्वैर्द्रोणस्य व्यत्यमिश्रयत् ॥ २१ ॥
राजन्! जिस समय वह मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था, उसी समय धृष्टद्युम्नने अपने रथके घोड़ोंको द्रोणाचार्यके घोड़ोंसे मिला दिया ॥ २१ ॥
ते हयाः साध्वशोभन्त मिश्रिता वातरंहसः ।
पारावतसवर्णाश्च रक्तशोणाश्च संयुगे ॥ २२ ॥
धृष्टद्युम्नके घोड़ोंका रंग कबूतरके समान था और द्रोणाचार्यके घोड़े लाल थे। उस युद्धके मैदानमें परस्पर मिले हुए वे वायुके समान वेगशाली अश्व बड़ी शोभा पा रहे थे ॥
पारावतसवर्णास्ते रक्तशोणविमिश्रिताः ।
हयाः शुशुभिरे राजन् मेघा इव सविद्युतः ॥ २३ ॥
राजन्! कबूतरके समान वर्णवाले घोड़े लाल रंगके घोड़ोंसे मिलकर बिजलियोंसहित मेघोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ २३ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु सम्प्रेक्ष्य द्रोणमभ्याशमागतम् ।