सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 622

नार्जुनः समरे शक्यो जेतुं परपुरंजयः ॥ २८ ॥
युद्धमें वज्रधारी इन्द्रको भी जीता जा सकता है; परंतु समरांगणमें शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले अर्जुनको जीतना असम्भव है ॥ २८ ॥
येन भोजश्च हार्दिक्यो भवांश्च त्रिदशोपमः ।
अस्त्रप्रतापेन जितौ श्रुतायुश्च निबर्हितः ॥ २९ ॥
सुदक्षिणश्च निहतः स च राजा श्रुतायुधः ।
श्रुतायुश्चाच्युतायुश्च म्लेच्छाश्चायुतशो हताः ॥ ३० ॥
तं कथं पाण्डवं युद्धे दहन्तमिव पावकम् ।
प्रतियोत्स्यामि दुर्धर्षं तमहं शस्त्रकोविदम् ॥ ३१ ॥
जिसने भोजवंशी कृतवर्मा तथा देवताओंके समान तेजस्वी आपको भी अपने अस्त्रके प्रतापसे पराजित कर दिया, श्रुतायुका संहार कर डाला, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा राजा श्रुतायुधको भी मार डाला, श्रुतायु, अच्युतायु तथा सहस्रों म्लेच्छ सैनिकोंके भी प्राण ले लिये, युद्धमें अग्निके समान शत्रुओंको दग्ध करनेवाले और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता उस दुर्धर्ष वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ मैं कैसे युद्ध कर सकूँगा? ॥ २९–३१ ॥
क्षमं च मन्यसे युद्धं मम तेनाद्य संयुगे ।
परवानस्मि भवति प्रेष्यवद् रक्ष मद्यशः ॥ ३२ ॥
यदि आज युद्धस्थलमें आप अर्जुनके साथ मेरा युद्ध करना उचित मानते हैं तो मैं एक सेवककी भाँति आपकी आज्ञाके अधीन हूँ। आप मेरे यशकी रक्षा कीजिये ॥ ३२ ॥

द्रोण उवाच

सत्यं वदसि कौरव्य दुराधर्षो धनंजयः ।
अहं तु तत् करिष्यामि यथैनं प्रसहिष्यसि ॥ ३३ ॥
**द्रोणाचार्यने कहा—**कुरुनन्दन! तुम ठीक कहते हो। अर्जुन अवश्य दुर्जय वीर हैं। परंतु मैं एक ऐसा उपाय कर दूँगा, जिससे तुम उनका वेग सह सकोगे ॥ ३३ ॥
अद्भुतं चाद्य पश्यन्तु लोके सर्वधनुर्धराः ।
विषक्तं त्वयि कौन्तेयं वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३४ ॥
आज संसारके सम्पूर्ण धनुर्धर भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही कुन्तीकुमार अर्जुनको तुम्हारे साथ युद्धमें उलझे रहनेकी अद्भुत घटना देखें ॥ ३४ ॥
एष ते कवचं राजंस्तथा बध्नामि काञ्चनम् ।
यथा न बाणा नास्त्राणि प्रहरिष्यन्ति ते रणे ॥ ३५ ॥
राजन्! मैं यह सुवर्णमय कवच तुम्हारे शरीरमें इस प्रकार बाँध देता हूँ, जिससे युद्धस्थलमें छूटनेवाले बाण और अन्य अस्त्र तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकेंगे ॥ ३५ ॥
यदि त्वां सासुरसुराः सयक्षोरगराक्षसाः ।