सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 620

अस्मानेवोपजीवंस्त्वमस्माकं विप्रिये रतः।
न ह्यहं त्वां विजानामि मधुदिग्धमिव क्षुरम्॥ १४॥
'हमसे ही आपकी जीविका चलती है तो भी आप हमारा ही अप्रिय करनेमें संलग्न रहते हैं। मैं नहीं जानता था कि आप शहदमें डुबोये हुए छुरेके समान हैं॥ १४॥
नादास्यच्चेद् वरं मह्यं भवान् पाण्डवनिग्रहे।
नावारयिष्यं गच्छन्तमहं सिन्धुपतिं गृहान्॥ १५॥
'यदि आप मुझे अर्जुनको रोके रखनेका वर न देते तो मैं अपने घरको जाते हुए सिन्धुराज जयद्रथको कभी मना नहीं करता॥ १५॥
मया त्वाशंसमानेन त्वत्तस्त्राणमबुद्धिना।
आश्वासितः सिन्धुपतिर्मोहाद् दत्तश्च मृत्यवे॥ १६॥
'मुझ मूर्खने आपसे संरक्षण पानेका भरोसा करके सिन्धुराज जयद्रथको समझा-बुझाकर यहीं रोक लिया और इस प्रकार मोहवश मैंने उन्हें मौतके हाथमें सौंप दिया॥ १६॥
यमदंष्ट्रान्तरं प्राप्तो मुच्येतापि हि मानवः।
नार्जुनस्य वशं प्राप्तो मुच्येताजौ जयद्रथः॥ १७॥
'मनुष्य यमराजकी दाढ़ोंमें पड़कर भले ही बच जाय, परंतु रणभूमिमें अर्जुनके वशमें पड़े हुए जयद्रथके प्राण नहीं बच सकते॥ १७॥
स तथा कुरु शोणाश्व यथा मुच्येत सैन्धवः।
मम चार्तप्रलापानां मा क्रुधः पाहि सैन्धवम्॥ १८॥
'लाल घोड़ोंवाले आचार्य! आप कोई ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे सिन्धुराज जयद्रथ मृत्युसे छुटकारा पा सके। मैंने आर्त होनेके कारण जो प्रलाप किये हैं, उनके लिये क्रोध न कीजियेगा; जैसे भी हो, सिन्धुराजकी रक्षा कीजिये'॥ १८॥

द्रोण उवाच

नाभ्यासूयामि ते वाक्यमश्वत्थाम्नासि मे समः।
सत्यं तु ते प्रवक्ष्यामि तज्जुषस्व विशाम्पते॥ १९॥
द्रोणाचार्यने कहा—राजन्! तुमने जो बात कही है, उसके लिये मैं बुरा नहीं मानता; क्योंकि तुम मेरे लिये अश्वत्थामाके समान हो। परंतु जो सच्ची बात है, वह तुम्हें बता रहा हूँ; उसे ध्यान देकर सुनो—॥ १९॥
सारथिः प्रवरः कृष्णः शीघ्राश्चास्य हयोत्तमाः।
अल्पं च विवरं कृत्वा तूर्णं याति धनंजयः॥ २०॥
श्रीकृष्ण अर्जुनके श्रेष्ठ सारथि हैं तथा उनके उत्तम घोड़े भी तेज चलनेवाले हैं। इसलिये थोड़ा-सा भी अवकाश बनाकर अर्जुन तत्काल सेनामें घुस जाते हैं॥