महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा तु वर्तमाने वै संग्रामेऽतिभयंकरे ।। २२ ।।
दुर्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ।
महाराज! जब इस प्रकार अत्यन्त भयंकर संग्राम हो रहा था, उस समय दुर्योधनने राधापुत्र कर्णसे यों कहा— ।। २२ १/२ ।।
पश्य दुःशासनं वीरमभिमन्युवशं गतम् ।। २३ ।।
प्रतपन्तमिवादित्यं निघ्नन्तं शात्रवान् रणे ।
‘कर्ण! देखो, वीर दुःशासन सूर्यके समान शत्रु-सैनिकोंको संतप्त करता हुआ युद्धमें उन्हें मार रहा था, इसी अवस्थामें वह अभिमन्युके वशमें पड़ गया है ।।
अथ चैते सुसंरब्धाः सिंहा इव बलोत्कटाः ।। २४ ।।
सौभद्रमुद्यतास्त्रातुम्भ्यधावन्त पाण्डवाः ।
‘इधर ये क्रोधमें भरे हुए पाण्डव सुभद्राकुमारकी रक्षा करनेके लिये उद्यत हो प्रचण्ड बलशाली सिंहोंके समान धावा कर चुके हैं’ ।। २४ १/२ ।।
ततः कर्णः शरैस्तीक्ष्णैरभिमन्युं दुरासदम् ।। २५ ।।
अभ्यवर्षत संक्रुद्धः पुत्रस्य हितकृत् तव ।
यह सुनकर आपके पुत्रका हित करनेवाला कर्ण अत्यन्त क्रोधमें भरकर दुर्द्धर्ष वीर अभिमन्युपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ।। २५ १/२ ।।
तस्य चानुचरांस्तीक्ष्णैर्विव्याध परमेषुभिः ।। २६ ।।
अवज्ञापूर्वकं शूरः सौभद्रस्य रणाजिरे ।
शूरवीर कर्णने समरांगणमें सुभद्राकुमारके सेवकोंको भी तीखे एवं उत्तम बाणोंद्वारा अवहेलनापूर्वक बींध डाला ।। २६ १/२ ।।
अभिमन्युस्तु राधेयं त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ।। २७ ।।
अविध्यत् त्वरितो राजन् द्रोणं प्रेप्सुर्महामनाः ।
राजन्! उस समय महामनस्वी अभिमन्युने द्रोणाचार्यके समीप पहुँचनेकी इच्छा रखकर तुरंत ही तिहत्तर बाणोंद्वारा कर्णको घायल कर दिया ।। २७ १/२ ।।
तं तथा नाशकत् कश्चिद् द्रोणाद् वारयितुं रथी ।। २८ ।।
आरुजन्तं रथव्रातान् वज्रहस्तात्मजात्मजम् ।
कोई भी रथी रथसमूहोंको नष्ट-भ्रष्ट करते हुए इन्द्रकुमार अर्जुनके उस पुत्रको द्रोणाचार्यकी ओर जानेसे रोक न सका ।। २८ १/२ ।।
ततः कर्णो जयप्रेप्सुर्मानी सर्वधनुष्मताम् ।। २९ ।।
सौभद्रं शतशोऽविध्यदुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ।
सोऽस्त्रैरस्त्रविदां श्रेष्ठो रामशिष्यः प्रतापवान् ।। ३० ।।
समरे शत्रुदुर्धर्षमभिमन्युमपीडयत् ।