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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3182, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3182

अब्रवं पुरुषव्याघ्र यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ७ ॥
‘पुरुषसिंह श्रीकृष्ण! उसके ऐसा कहनेपर मैं यह सब जानती थी कि मुझपर बड़ा भारी संकट आनेवाला है, तथापि मैंने उससे यही कहा—‘जहाँ धर्म है, वहीं विजय है’ ॥ ७ ॥

यथा च युध्यमानस्त्वं न वै मुह्यसि पुत्रक ।
ध्रुवं शस्त्रजिताँल्लोकान् प्राप्स्यस्यमरवत् प्रभो ॥ ८ ॥
‘बेटा! शक्तिशाली पुत्र! यदि तुम युद्ध करते हुए धर्मसे मोहित न होओगे तो निश्चय ही देवताओंके समान शस्त्रोंद्वारा जीते हुए लोकोंको प्राप्त कर लोगे’ ॥ ८ ॥

इत्येवमब्रुवं पूर्वं नैनं शोचामि वै प्रभो ।
धृतराष्ट्रं तु शोचामि कृपणं हतबान्धवम् ॥ ९ ॥
‘प्रभो! यह बात मैंने पहले ही कह दी थी; इसलिये मुझे इस दुर्योधनके लिये शोक नहीं हो रहा है। मैं तो इन दीन राजा धृतराष्ट्रके लिये शोकमग्न हो रही हूँ, जिनके सारे भाई-बन्धु मार डाले गये ॥ ९ ।

अमर्षणं युधां श्रेष्ठं कृतास्त्रं युद्धदुर्मदम् ।
शयानं वीरशयने पश्य माधव मे सुतम् ॥ १० ॥
‘माधव! अमर्षशील, योद्धाओंमें श्रेष्ठ, अस्त्र-विद्याके ज्ञाता, रणदुर्मद तथा वीरशय्यापर सोये हुए मेरे इस पुत्रको देखो तो सही ॥ १० ॥

योऽयं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे याति परंतपः ।
सोऽयं पांसुषु शेतेऽद्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ११ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाला जो दुर्योधन मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे-आगे चलता था, वही आज यह धूलमें लोट रहा है। कालके इस उलट-फेरको तो देखो ॥ ११ ॥

ध्रुवं दुर्योधनो वीरो गतिं न सुलभां गतः ।
तथा ह्यभिमुखः शेते शयने वीरसेविते ॥ १२ ॥
‘निश्चय ही वीर दुर्योधन उस उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है, जो सबके लिये सुलभ नहीं है; क्योंकि यह वीरसेवित शय्यापर सामने मुँह किये सो रहा है ॥ १२ ॥

यं पुरा पर्युपासीना रमयन्ति वरस्त्रियः ।
तं वीरशयने सुप्तं रमयन्त्यशिवाः शिवाः ॥ १३ ॥
‘पूर्वकालमें जिसके पास बैठकर सुन्दरी स्त्रियाँ उसका मनोरंजन करती थीं, वीरशय्यापर सोये हुए आज उसी वीरका ये अमंगलकारिणी गीदड़ियाँ मन-बहलाव करती हैं ॥ १३ ॥

यं पुरा पर्युपासीना रमयन्ति महीक्षितः ।
महीतलेस्थं निहतं गृध्रास्तं पर्युपासते ॥ १४ ॥