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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3166, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3166

राजपुत्रीं च पाञ्चालीमेकवस्त्रां रजस्वलाम् ।
भवत्या विदितं सर्वमुक्तवान् यत् सुतस्तव ॥ ६ ॥
‘राजकुमारी द्रौपदीसे, जो एक वस्त्र धारण किये रजस्वला-अवस्थामें थी, आपके पुत्रने जो कुछ कहा था, वह सब आप जानती हैं ॥ ६ ॥
सुयोधनमसंगृह्य न शक्या भूः ससागरा ।
केवला भोक्तुमस्माभिरतश्चैतत् कृतं मया ॥ ७ ॥
‘दुर्योधनका संहार किये बिना हमलोग निष्कण्टक पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकते थे, इसलिये मैंने यह अयोग्य कार्य किया ॥ ७ ॥
तथाप्यप्रियमस्माकं पुत्रस्ते समुपाचरत् ।
द्रौपद्या यत् सभामध्ये सव्यमूरुमदर्शयत् ॥ ८ ॥
‘आपके पुत्रने तो हम सब लोगोंका इससे भी बढ़कर अप्रिय किया था कि उसने भरी सभामें द्रौपदीको अपनी बाँयीं जाँघ दिखायी ॥ ८ ॥
तदैव वध्यः सोऽस्माकं दुराचारश्च ते सुतः ।
धर्मराजाज्ञया चैव स्थिताः स्म समये तदा ॥ ९ ॥
‘आपके उस दुराचारी पुत्रको तो हमें उसी समय मार डालना चाहिये था; परंतु धर्मराजकी आज्ञासे हमलोग समयके बन्धनमें बँधकर चुप रह गये ॥ ९ ॥
वैरमुद्दीपितं राज्ञि पुत्रेण तव तन्महत् ।
क्लेशिताश्च वने नित्यं तत एतत् कृतं मया ॥ १० ॥
‘रानी! आपके पुत्रने उस महान् वैरकी आगको और भी प्रज्वलित कर दिया और हमें वनमें भेजकर सदा क्लेश पहुँचाया; इसीलिये हमने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया है ॥ १० ॥
वैरस्यास्य गतः पारं हत्वा दुर्योधनं रणे ।
राज्यं युधिष्ठिरः प्राप्तो वयं च गतमन्यवः ॥ ११ ॥
‘रणभूमिमें दुर्योधनका वध करके हमलोग इस वैरसे पार हो गये। राजा युधिष्ठिरको राज्य मिल गया और हमलोगोंका क्रोध शान्त हो गया' ॥ ११ ॥

गान्धार्युवाच

न तस्यैष वधस्तात यत् प्रशंससि मे सुतम् ।
कृतवांश्चापि तत् सर्वं यदिदं भाषसे मयि ॥ १२ ॥
गान्धारी बोलीं— तात! तुम मेरे पुत्रकी इतनी प्रशंसा कर रहे हो; इसलिये यह उसका वध नहीं हुआ (वह अपने यशोमय शरीरसे अमर है) और मेरे सामने तुम जो कुछ कह रहे हो, वह सारा अपराध दुर्योधनने अवश्य किया है ॥ १२ ॥
हताश्वे नकुले यत्तु वृषेनेन भारत ।