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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3163, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3163

पुत्रशोकेन तु बलान्मनो विह्वलतीव मे ॥ १४ ॥
गान्धारी बोली— भगवन्! मैं पाण्डवोंके प्रति कोई दुर्भाव नहीं रखती और न इनका विनाश ही चाहती हूँ; परंतु क्या करूँ? पुत्रोंके शोकसे मेरा मन हठात् व्याकुल-सा हो जाता है ॥ १४ ॥
यथैव कुन्त्या कौन्तेया रक्षितव्यास्तथा मया ।
तथैव धृतराष्ट्रेण रक्षितव्या यथा त्वया ॥ १५ ॥
कुन्तीके ये बेटे जिस प्रकार कुन्तीके द्वारा रक्षणीय हैं, उसी प्रकार मुझे भी इनकी रक्षा करनी चाहिये। जैसे आप इनकी रक्षा चाहते हैं, उसी प्रकार महाराज धृतराष्ट्रका भी कर्तव्य है कि इनकी रक्षा करें ॥ १५ ॥
दुर्योधनापराधेन शकुनेः सौबलस्य च ।
कर्णदुःशासनाभ्यां च कृतोऽयं कुरुसंक्षयः ॥ १६ ॥
कुरुकुलका यह संहार तो दुर्योधन, मेरे भाई शकुनि, कर्ण तथा दुःशासनके अपराधसे ही हुआ है ॥ १६ ॥
नापराध्यति बीभत्सुर्न च पार्थो वृकोदरः ।
नकुलः सहदेवश्च नैव जातु युधिष्ठिरः ॥ १७ ॥
इसमें न तो अर्जुनका अपराध है और न कुन्तीपुत्र भीमसेनका। नकुल-सहदेव और युधिष्ठिरको भी कभी इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता ॥ १७ ॥
युध्यमाना हि कौरव्याः कृन्तमानाः परस्परम् ।
निहताः सहिताश्चान्यैस्तच्च नास्त्यप्रियं मम ॥ १८ ॥
कौरव आपसमें ही जूझकर मारकाट मचाते हुए अपने दूसरे साथियोंके साथ मारे गये हैं; अतः इसमें मुझे अप्रिय लगनेवाली कोई बात नहीं है ॥ १८ ॥
किं तु कर्माकरोद् भीमो वासुदेवस्य पश्यतः ।
दुर्योधनं समाहूय गदायुद्धे महामनाः ॥ १९ ॥
शिक्षयाभ्यधिकं ज्ञात्वा चरन्तं बहुधा रणे ।
अधो नाभ्याः प्रहृतवांस्तन्मे कोपमवर्धयत् ॥ २० ॥
परंतु महामना भीमसेनने गदायुद्धके लिये दुर्योधनको बुलाकर श्रीकृष्णके देखते-देखते उसके प्रति जो बर्ताव किया है, वह मुझे अच्छा नहीं लगा। वह रणभूमिमें अनेक प्रकारके पैंतरे दिखाता हुआ विचर रहा था; अतः शिक्षामें उसे अपनेसे अधिक जान भीमने जो उसकी नाभिसे नीचे प्रहार किया, इनके इसी बर्तावने मेरे क्रोधको बढ़ा दिया है ॥ १९-२० ॥
कथं नु धर्मं धर्मज्ञैः समुद्दिष्टं महात्मभिः ।
त्यजेयुराहवे शूराः प्राणहेतोः कथंचन ॥ २१ ॥