महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3055, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! जैसे फरसोंसे विशाल जंगल काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उनके द्वारा छिन्न-भिन्न की जाती हुई आपकी विशाल वाहिनीका महान् आर्तनाद सुनायी पड़ता था ॥ ५ ॥
अहमेकोऽवशिष्टस्तु तस्मात् सैन्यान्महामते ।
मुक्तः कथंचिद् धर्मात्मन् व्यग्राच्च कृतवर्मणः ॥ ६ ॥
महामते! धर्मात्मन्! उस विशाल सेनासे अकेला मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूँ। कृतवर्मा दूसरोंको मारनेमें लगा हुआ था; इसीलिये मैं उस संकटसे मुक्त हो सका हूँ ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा वाक्यमशिवं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
पपात मह्यां दुर्धर्षः पुत्रशोकसमन्वितः ॥ ७ ॥
वह अमंगलमय वचन सुनकर दुर्धर्ष राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पुत्रशोकसे संतप्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ७ ॥
पतन्तं तमतिक्रम्य परिजग्राह सात्यकिः ।
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ८ ॥
गिरते समय आगे बढ़कर सात्यकिने उन्हें थाम लिया। भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेवने भी उन्हें पकड़ लिया ॥ ८ ॥
लब्धचेतास्तु कौन्तेयः शोकविह्वलया गिरा ।
जित्वा शत्रून् जितः पश्चात् पर्यदेवयदार्तवत् ॥ ९ ॥
फिर होशमें आनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल वाणीद्वारा आर्तकी भाँति विलाप करने लगे—‘हाय! मैं शत्रुओंको पहले जीतकर पीछे पराजित हो गया ॥ ९ ॥
दुर्विदा गतिरर्थानामपि ये दिव्यचक्षुषः ।
जीयमाना जयन्त्यन्ये जयमाना वयं जिताः ॥ १० ॥
‘जो लोग दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हैं, उनके लिये भी पदार्थोंकी गतिको समझना अत्यन्त दुष्कर है। हाय! दूसरे लोग तो हारकर जीतते हैं; किंतु हमलोग जीतकर हार गये हैं! ॥ १० ॥
हत्वा भ्रातॄन् वयस्यांश्च पितॄन् पुत्रान् सुहृद्गणान् ।
बन्धूनमात्यान् पौत्रांश्च जित्वा सर्वाञ्जिता वयम् ॥ ११ ॥
‘हमने भाइयों, समवयस्क मित्रों, पितृतुल्य पुरुषों, पुत्रों, सुहृद्गणों, बन्धुओं, मन्त्रियों तथा पौत्रोंकी हत्या करके उन सबको जीतकर विजय प्राप्त की थी; परंतु अब शत्रुओंद्वारा हम ही पराजित हो गये ॥ ११ ॥
अनर्थो ह्यर्थसंकाशस्तथानर्थोऽर्थदर्शनः ।
जयोऽयमजयाकारो जयस्तस्मात् पराजयः ॥ १२ ॥
‘कभी-कभी अनर्थ भी अर्थ-सा हो जाता है और अर्थके रूपमें दिखायी देनेवाली वस्तु भी अनर्थके रूपमें परिणत हो जाती है, इसी प्रकार हमारी यह विजय भी पराजयका ही