महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3035, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्र केचिन्नरा भीता व्यलीयन्त महीतले ।। ९२ ।।
तथैव तान् निपतितानपिंषन् गजवाजिनः ।
कितने ही योद्धा भयभीत हो पृथ्वीपर छिपे पड़े थे। उन्हें उसी अवस्थामें भागते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे कुचल दिया ।। ९२ १/२ ।।
तस्मिंस्तथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ ।। ९३ ।।
हृष्टानि व्यनदन्नुच्चैर्मुदा भरतसत्तम ।
पुरुषप्रवर! भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जब वह मार-काट मची हुई थी, उस समय हर्षमें भरे हुए राक्षस बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते थे ।। ९३ १/२ ।।
स शब्दः पूरितो राजन् भूतसंघैर्मुदायुतैः ।। ९४ ।।
अपूरयद् दिशः सर्वा दिवं चातिमहान् स्वनः ।
राजन्! आनन्दमग्न हुए भूतसमुदायोंके द्वारा किया हुआ वह महान् कोलाहल सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशमें गूँज उठा ।। ९४ १/२ ।।
तेषामार्तरवं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिनः ।। ९५ ।।
मुक्ताः पर्यपतन् राजन् मृद्नन्तः शिबिरे जनम् ।
राजन्! मारे जानेवाले योद्धाओंका आर्तनाद सुनकर हाथी और घोड़े भयसे थर्रा उठे और बन्धनमुक्त हो शिविरमें रहनेवाले लोगोंको रौंदते हुए चारों ओर दौड़ लगाने लगे ।। ९५ १/२ ।।
तैस्तत्र परिधावद्भिश्चरणोदीरितं रजः ।। ९६ ।।
अकरोच्छिबिरे तेषां रजन्यां द्विगुणं तमः ।
उन दौड़ते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे जो धूल उड़ायी थी, उसने पाण्डवोंके शिविरमें रात्रिके अन्धकारको दुगुना कर दिया ।। ९६ १/२ ।।
तस्मिंस्तमसि संजाते प्रमूढाः सर्वतो जनाः ।। ९७ ।।
नाजानन् पितरः पुत्रान् भ्रातॄन् भ्रातर एव च ।
वह घोर अन्धकार फैल जानेपर वहाँ सब लोगोंपर मोह छा गया। उस समय पिता पुत्रोंको और भाई भाइयोंको नहीं पहचान पाते थे ।। ९७ १/२ ।।
गजा गजानतिक्रम्य निर्मनुष्या हया हयान् ।। ९८ ।।
अताडयंस्तथाभञ्जंस्तथामृद्नंश्च भारत ।
भारत! हाथी हाथियोंपर और बिना सवारके घोड़े घोड़ोंपर आक्रमण करके एक-दूसरेपर चोट करने लगे। उन्होंने अंग-भंग करके एक-दूसरेको रौंद डाला ।। ९८ १/२ ।।
ते भग्नाः प्रपतन्ति स्म निघ्नन्तश्च परस्परम् ।। ९९ ।।
न्यपातयंस्तथा चान्यान् पातयित्वा तदापिषन् ।