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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3000, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3000

अर्थांश्चिन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः ।
तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेऽद्य चतुष्टयम् ॥ २२ ॥
'मामाजी! जो मनुष्य शोकसे आतुर हो, अमर्षसे भरा हुआ हो, नाना प्रकारके कार्योंकी चिन्ता कर रहा हो अथवा किसी कामनामें आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है? देखिये, ये चारों बातें आज मेरे ऊपर एक साथ आ पड़ी हैं ॥ २२ ॥
यस्य भागश्चतुर्थो मे स्वप्नमह्नाय नाशयेत् ।
किं नाम दुःखं लोकेऽस्मिन् पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ २३ ॥
हृदयं निर्दहन्मेऽद्य रात्र्यहानि न शाम्यति ।
'इन चारोंका एक चौथाई भाग जो क्रोध है, वही मेरी निद्राको तत्काल नष्ट किये देता है। अपने पिताके वधकी घटनाका बारंबार स्मरण करके इस संसारमें कौन-सा ऐसा दुःख है, जिसका मुझे अनुभव न होता हो। वह दुःखकी आग रात-दिन मेरे हृदयको जलाती हुई अबतक बुझ नहीं पा रही है ॥ २३ १/२ ॥
यथा च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः ॥ २४ ॥
प्रत्यक्षमपि ते सर्वं तन्मे मर्माणि कृन्तति ।
कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तपि जीवति ॥ २५ ॥
'इन पापियोंने विशेषतः मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है। वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है। ऐसी अवस्थामें मेरे-जैसा वीर इस जगत्में दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है? ॥ २४-२५ ॥
द्रोणो हतेति यद् वाचः पञ्चालानां शृणोम्यहम् ।
धृष्टद्युम्नमहत्वा तु नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २६ ॥
'द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये' यह बात जब मैं पांचालोंके मुखसे सुनता आ रहा हूँ, तब धृष्टद्युम्नका वध किये बिना जीवित नहीं रह सकता ॥
स मे पितुर्वधाद् वध्यः पञ्चाला ये च संगताः ।
विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मया श्रुतः ॥ २७ ॥
स पुनर्हृदयं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् ।
'धृष्टद्युम्न तो पिताजीका वध करनेके कारण मेरा वध्य होगा और उसके संगी-साथी जो पांचाल हैं, वे भी उसका साथ देनेके कारण मारे जायँगे। इधर जिसकी जाँघें तोड़ डाली गयी हैं, उस राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने अपने कानों सुना है, वह किस क्रूर मनुष्यके भी हृदयको शोक-दग्ध नहीं कर देगा? ॥ २७ १/२ ॥
कस्य ह्यकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत् ॥ २८ ॥
नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृग् वचः पुनः ।
'टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनकी वैसी बात पुनः सुनकर किस निष्ठुरके भी नेत्रोंसे आँसू नहीं बह चलेगा? ॥ २८ १/२ ॥