महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2969, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकानां च भवान् यत्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १६ ॥
‘निश्चय ही काल और लोकोंकी गतिको जानना किसी प्रकार भी कठिन ही है, जिसके अधीन होकर आप धूलमें सने हुए पड़े हैं ॥ १६ ॥
एष मूर्धाभिषिक्तानामग्रे गत्वा परंतपः ।
सतृणं ग्रसते पांसुं पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १७ ॥
‘अहो! ये मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चलनेवाले शत्रुसंतापी महाराज दुर्योधन तिनकोंसहित धूल फाँक रहे हैं। यह कालका उलट-फेर तो देखो ॥ १७ ॥
क्व ते तदमलं छत्रं व्यजनं क्व च पार्थिव ।
सा च ते महती सेना क्व गता पार्थिवोत्तम ॥ १८ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! महाराज! कहाँ है आपका वह निर्मल छत्र, कहाँ है व्यजन और कहाँ गयी आपकी वह विशाल सेना? ॥ १८ ॥
दुर्विज्ञेया गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे ।
यद् वै लोकगुरुर्भूत्वा भवानेतां दशां गतः ॥ १९ ॥
‘किस कारणसे कौन-सा कार्य होगा, इसको समझ लेना निश्चय ही बहुत कठिन है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्के आदरणीय नरेश होकर भी आज तुम इस दशाको पहुँच गये ॥ १९ ॥
अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् ।
भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ॥ २० ॥
‘तुम तो अपनी साम्राज्य-लक्ष्मीके द्वारा इन्द्रकी समानता करनेवाले थे। आज तुमपर भी यह संकट आया हुआ देखकर निश्चय हो गया कि किसी भी मनुष्यकी सम्पत्ति सदा स्थिर नहीं देखी जा सकती’ ॥ २० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दुःखितस्य विशेषतः ।
उवाच राजन् पुत्रस्ते प्राप्तकालमिदं वचः ॥ २१ ॥
विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां शोकजं बाष्पमुत्सृजन् ।
कृपादीन् स तदा वीरान् सर्वानैव नराधिपः ॥ २२ ॥
राजन्! अत्यन्त दुःखी हुए अश्वत्थामाकी वह बात सुनकर आपके पुत्र राजा दुर्योधनके नेत्रोंसे शोकके आँसू बहने लगे। उसने दोनों हाथोंसे नेत्रोंको पोंछा और कृपाचार्य आदि समस्त वीरोंसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २१-२२ ॥
ईदृशो लोकधर्मोऽयं धात्रा निर्दिष्ट उच्यते ।
विनाशः सर्वभूतानां कालपर्यायमागतः ॥ २३ ॥
‘मित्रो! इस मर्त्यलोकका ऐसा ही धर्म (नियम) है। विधाताने ही इसका निर्देश किया है, ऐसा कहा जाता है; इसलिये कालक्रमसे एक-न-एक दिन सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशकी घड़ी आ ही जाती है ॥ २३ ॥