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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2930, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2930

दुष्करं भवता कर्म रणेऽद्य सुमहत् कृतम् ।
कौरवेन्द्रं रणे हत्वा गदयातिकृतश्रमम् ॥ ७ ॥
‘कौरवराज दुर्योधनने गदायुद्धमें बड़ा भारी परिश्रम किया था। आज रणभूमिमें उसका वध करके आपने महान् एवं दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है ॥ ७ ॥
इन्द्रेणेव हि वृत्रस्य वधं परमसंयुगे ।
त्वया कृतममन्यन्त शत्रोर्वधमिमं जनाः ॥ ८ ॥
‘जैसे महासमरमें इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था, आपके द्वारा किया हुआ यह शत्रुको संहार भी उसी कोटिका है—ऐसा सब लोग समझने लगे हैं ॥ ८ ॥
चरन्तं विविधान् मार्गान् मण्डलानि च सर्वशः ।
दुर्योधनमिमं शूरं कोऽन्यो हन्याद् वृकोदरात् ॥ ९ ॥
‘भला, नाना प्रकारके पैंतरे बदलते और सब तरहकी मण्डलाकार गतियोंसे चलते हुए इस शूरवीर दुर्योधनको भीमसेनके सिवा दूसरा कौन मार सकता था? ॥ ९ ॥
वैरस्य च गतः पारं त्वमिहान्यैः सुदुर्गमम् ।
अशक्यमेतदन्येन सम्पादयितुमीदृशम् ॥ १० ॥
‘आप वैरके समुद्रसे पार हो गये, जहाँ पहुँचना दूसरे लोगोंके लिये अत्यन्त कठिन है। दूसरे किसीके लिये ऐसा पराक्रम कर दिखाना सर्वथा असम्भव है ॥
कुञ्जरेणेव मत्तेन वीर संग्राममूर्धनि ।
दुर्योधनशिरो दिष्ट्या पादेन मृदितं त्वया ॥ ११ ॥
‘वीर! मतवाले गजराजकी भाँति आपने युद्धके मुहानेपर अपने पैरसे दुर्योधनके मस्तकको कुचल दिया है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ११ ॥
सिंहेन महिषस्येव कृत्वा सङ्गरमुत्तमम् ।
दुःशासनस्य रुधिरं दिष्ट्या पीतं त्वयानघ ॥ १२ ॥
‘अनघ! जैसे सिंहने भैंसेका खून पी लिया हो, उसी प्रकार आपने महान् युद्ध ठानकर दुःशासनके रक्तका पान किया है, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ॥
ये विप्रकुर्वन् राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
मूर्ध्नि तेषां कृतः पादो दिष्ट्या ते स्वेन कर्मणा ॥ १३ ॥
‘जिन लोगोंने धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका अपराध किया था, उन सबके मस्तकपर आपने अपने पराक्रमद्वारा पैर रख दिया, यह कितने हर्षका विषय है ॥ १३ ॥
अमित्राणामधिष्ठानाद् वधाद् दुर्योधनस्य च ।
भीम दिष्ट्या पृथिव्यां ते प्रथितं सुमहद् यशः ॥ १४ ॥
‘भीम! शत्रुओंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करने और दुर्योधनको मार डालनेसे भाग्यवश इस भूमण्डलमें आपका महान् यश फैल गया है ॥ १४ ॥
एवं नूनं हते वृत्रे शक्रं नन्दन्ति वन्दिनः ।