महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर ये मुनिश्रेष्ठ देवल फिर सोचने लगे—'मैंने इन्हें अभी-अभी समुद्रतटपर देखा है, फिर ये आश्रममें कैसे उपस्थित हैं?' ॥ २३ १/२ ॥
एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः ॥ २४ ॥
उत्पपाताश्रमात् तस्मादन्तरिक्षं विशाम्पते ।
जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः ॥ २५ ॥
प्रजानाथ! ऐसा विचार करते हुए वे मन्त्रशास्त्रके पारंगत विद्वान् मुनि उस आश्रमसे आकाशकी ओर उड़ चले। उस समय भिक्षु जैगीषव्यकी परीक्षा लेनेके लिये उन्होंने ऐसा किया ॥ २४-२५ ॥
सोऽन्तरिक्षचरान् सिद्धान् समपश्यत् समाहितान् ।
जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत ॥ २६ ॥
ऊपर जाकर उन्होंने बहुत-से अन्तरिक्षचारी एकाग्रचित्तवाले सिद्धोंको देखा। साथ ही उन सिद्धोंके द्वारा पूजे जाते हुए जैगीषव्य मुनिका भी उन्हें दर्शन हुआ ॥
ततोऽसितः सुसंरब्धो व्यवसायी दृढव्रतः ।
अपश्यद् वै दिवं यान्तं जैगीषव्यं स देवलः ॥ २७ ॥
तदनन्तर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले दृढ़निश्चयी असित देवल मुनि रोषावेशमें भर गये। फिर उन्होंने जैगीषव्यको स्वर्गलोकमें जाते देखा ॥ २७ ॥
तस्मात् तु पितृलोकं तं व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत ।
पितृलोकाच्च तं यान्तं याम्यं लोकमपश्यत ॥ २८ ॥
स्वर्गलोकसे उन्हें पितृलोकमें और पितृलोकसे यमलोकमें जाते देखा ॥ २८ ॥
तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिप्लुतम् ।
व्रजन्तमन्वपश्यत् स जैगीषव्यं महामुनिम् ॥ २९ ॥
वहाँसे भी ऊपर उठकर महामुनि जैगीषव्य जलमय चन्द्रलोकमें जाते दिखायी दिये ॥ २९ ॥
लोकान् समुत्पतन्तं तु शुभानेकान्तयाजिनाम् ।
ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्ततश्चाप्युत्पपात ह ॥ ३० ॥
फिर वे एकान्ततः यज्ञ करनेवाले पुरुषोंके उत्तम लोकोंकी ओर उड़ते दिखायी दिये। वहाँसे वे अग्निहोत्रियोंके लोकोंमें गये ॥ ३० ॥
दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः ।
तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुयाजिनाम् ॥ ३१ ॥
उन लोकोंसे ऊपर उठकर वे बुद्धिमान् मुनि उन तपोधनोंके लोकमें गये, जो दर्श और पौर्णमास यज्ञ करते हैं। वहाँसे वे पशुयाग करनेवालोंके लोकोंमें जाते दिखायी दिये ॥ ३१ ॥