महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘कठोर व्रतका पालन करनेवाली महाभागे! इस प्रकार विशुद्धहृदया अरुन्धती देवीने यहाँ परम सिद्धि प्राप्त की थी, जैसी कि तुमने मेरे लिये तप करके सिद्धि पायी है। भद्रे! तुमने इस व्रतमें विशेष आत्मसमर्पण किया है ।। ५४-५५ ।।
तथा चेदं ददाम्यद्य नियमेन सुतोषितः ।
विशेषं तव कल्याणि प्रयच्छामि वरं वरे ।। ५६ ।।
‘सती कल्याणि! मैं तुम्हारे नियमसे संतुष्ट होकर यह विशेष वर प्रदान करता हूँ ।। ५६ ।।
अरुन्धत्या वरस्तस्या यो दत्तो वै महात्मना ।
तस्य चाहं प्रभावेण तव कल्याणि तेजसा ।। ५७ ।।
प्रवक्ष्यामि परं भूयो वरमत्र यथाविधि ।
‘कल्याणि! महात्मा भगवान् शंकरने अरुन्धती देवीको जो वर दिया था, तुम्हारे तेज और प्रभावसे मैं उससे भी बढ़कर उत्तम वर देता हूँ ।। ५७ १/२ ।।
यस्त्वेकां रजनीं तीर्थे वत्स्यते सुसमाहितः ।। ५८ ।।
स स्नात्वा प्राप्स्यते लोकान् देहन्यासात् सुदुर्लभान् ।
‘जो इस तीर्थमें एकाग्रचित्त होकर एक रात निवास करेगा, वह यहाँ स्नान करके देह-त्यागके पश्चात् उन पुण्यलोकोंमें जायगा, जो दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं’ ।। ५८ १/२ ।।
इत्युक्त्वा भगवान् देवः सहस्राक्षः प्रतापवान् ।। ५९ ।।
श्रुतावतीं ततः पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुनः ।
पुण्यमयी श्रुतावतीसे ऐसा कहकर सहस्र नेत्रधारी प्रतापी भगवान् इन्द्रदेव पुनः स्वर्गलोकमें चले गये ।। ५९ १/२ ।।
गते वज्रधरे राजंस्तत्र वर्षं पपात ह ।। ६० ।।
पुष्पाणां भरतश्रेष्ठ दिव्यानां पुण्यगन्धिनाम् ।
देवदुन्दुभयश्चापि नेदुस्तत्र महास्वनाः ।। ६१ ।।
राजन्! भरतश्रेष्ठ! वज्रधारी इन्द्रके चले जानेपर वहाँ पवित्र सुगन्धवाले दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और महान् शब्द करनेवाली देवदुन्दुभियाँ बज उठीं ।।
मारुतश्च ववौ पुण्यः पुण्यगन्धो विशाम्पते ।
उत्सृज्य तु शुभा देहं जगामास्य च भार्यताम् ।। ६२ ।।
तपसोग्रेण तं लब्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत ।
प्रजानाथ! पावन सुगंधसे युक्त पवित्र वायु चलने लगी। शुभलक्षणा श्रुतावती अपने शरीरको त्यागकर इन्द्रकी भार्या हो गयी। अच्युत! वह अपनी उग्र तपस्यासे इन्द्रको पाकर उनके साथ रमण करने लगी ।। ६२ १/२ ।।
जनमेजय उवाच