सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2825, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2825

और रीछोंके समुदाय भाग रहे थे तथा उनके चीत्कारसे वह पर्वत गूँज उठा था, हरिणोंके
आर्तनादसे उस पर्वतका वनप्रान्त प्रतिध्वनित हो रहा था, गुफासे निकलकर सहसा
भागनेवाले सिंहों और शरभोंके कारण वह पर्वत बड़ी शोचनीय दशामें पड़ गया था तो भी
वह सुशोभित-सा ही हो रहा था ।।
विद्याधराः समुत्पेतुस्तस्य शृङ्गनिवासिनः ।
किन्नराश्च समुद्विग्नाः शक्तिपातरवोद्धताः ।। ८८ ।।
उस पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले विद्याधर और किन्नर शक्तिके आघातजनित
शब्दसे उद्विग्न होकर आकाशमें उड़ गये ।। ८८ ।।
ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशः ।
प्रदीप्तात् पर्वतश्रेष्ठाद् विचित्राभरणस्रजः ।। ८९ ।।
तत्पश्चात् उस जलते हुए श्रेष्ठ पर्वतसे विचित्र आभूषण और माला धारण करनेवाले
सैकड़ों और हजारों दैत्य निकल पड़े ।। ८९ ।।
तान् निजघ्नुरतिक्रम्य कुमारानुचरा मृधे ।
स चैव भगवान् क्रुद्धो दैत्येन्द्रस्य सुतं तदा ।। ९० ।।
सहानुजं जघानाशु वृत्रं देवपतिर्यथा ।
कुमारके पार्षदोंने युद्धमें आक्रमण करके उन सब दैत्योंको मार गिराया। साथ ही
भगवान् कार्तिकेयने कुपित होकर वृत्रासुरको मारनेवाले देवराज इन्द्रके समान दैत्यराजके
उस पुत्रको उसके छोटे भाईसहित शीघ्र ही मार डाला ।।
बिभेद क्रौञ्चं शक्त्या च पावकिः परवीरहा ।। ९१ ।।
बहुधा चैकधा चैव कृत्वाऽऽत्मानं महाबलः ।
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली अग्निपुत्र कार्तिकेयने अपने-आपको एक और
अनेक रूपोंमें प्रकट करके शक्तिद्वारा क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ।।
शक्तिः क्षिप्ता रणे तस्य पाणिमेति पुनः पुनः ।। ९२ ।।
एवंप्रभावो भगवांस्ततो भूयश्च पावकिः ।
शौर्यादिगुणयोगेन तेजसा यशसा श्रिया ।। ९३ ।।
क्रौञ्चस्तेन विनिर्भिन्नो दैत्याश्च शतशो हताः ।
रणभूमिमें बार-बार चलायी हुई उनकी शक्ति शत्रुका संहार करके पुनः उनके हाथमें
लौट आती थी। अग्निपुत्र कार्तिकेयका ऐसा ही प्रभाव है, बल्कि इससे भी बढ़कर है। वे
शौर्यकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दुगुने तेज, यश और श्रीसे सम्पन्न हैं। उन्होंने क्रौंच पर्वतको
विदीर्ण करके सैकड़ों दैत्योंको मार गिराया ।। ९२-९३ १/२ ।।
ततः स भगवान् देवो निहत्य विबुधद्विषः ।। ९४ ।।
सभाज्यमानो विबुधैः परं हर्षमवाप ह ।

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 2825, कुल 3237 में से · SarvaKosh