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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2797, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2797

नारदप्रमुखाश्चापि देवगन्धर्वसत्तमाः ॥ ३१ ॥
देवर्षयश्च सिद्धाश्च बृहस्पतिपुरोगमाः ।
पितरो जगतः श्रेष्ठा देवानापि देवताः ॥ ३२ ॥
तेऽपि तत्र समाजग्मुर्यामा धामाश्च सर्वशः ।
देवताओं और गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ नारद आदि देवर्षि, बृहस्पति आदि सिद्ध, सम्पूर्ण जगत्से श्रेष्ठ तथा देवताओंके भी देवता पितृगण, सम्पूर्ण यामगण और धामगण भी वहाँ आये थे ॥ ३१-३२ १/२ ॥

स तु बालोऽपि बलवान् महायोगबलान्वितः ॥ ३३ ॥
अभ्याजगाम देवेशं शूलहस्तं पिनाकिनम् ।
बालक होनेपर भी बलशाली एवं महान् योगबलसे सम्पन्न कुमार त्रिशूल और पिनाक धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् शिवकी ओर चले ॥ ३३ १/२ ॥

तमाव्रजन्तमालक्ष्य शिवस्यासीन्मनोगतम् ॥ ३४ ॥
युगपच्छैलपुत्र्याश्च गङ्गायाः पावकस्य च ।
कं नु पूर्वमयं बालो गौरवादभ्युपैष्यति ॥ ३५ ॥
अपि मामिति सर्वेषां तेषामासीन्मनोगतम् ।
उन्हें आते देख एक ही समय भगवान् शंकर, गिरिराजनन्दिनी उमा, गंगा और अग्निदेवके मनमें यह संकल्प उठा कि देखें यह बालक पिता-माताका गौरव प्रदान करनेके लिये पहले किसके पास जाता है? क्या यह मेरे पास आयेगा? यह प्रश्न उन सबके मनमें उठा ॥

तेषामेतमभिप्रायं चतुर्णामुपलक्ष्य सः ॥ ३६ ॥
युगपद् योगमास्थाय ससर्ज विविधास्तनूः ।
तब उन सबके अभिप्रायको लक्ष्य करके कुमारने एक ही साथ योगबलका आश्रय ले अपने अनेक शरीर बना लिये ॥ ३६ १/२ ॥

ततोऽभवच्चतुर्मूर्तिः क्षणेन भगवान् प्रभुः ॥ ३७ ॥
तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठतः ।
तदनन्तर प्रभावशाली भगवान् स्कन्द क्षणभरमें चार रूपोंमें प्रकट हो गये। पीछे जो उनकी मूर्तियाँ प्रकट हुईं, उनका नाम क्रमशः शाख, विशाख और नैगमेय हुआ ॥

एवं स कृत्वा ह्यात्मानं चतुर्धा भगवान् प्रभुः ॥ ३८ ॥
यतो रुद्रस्ततः स्कन्दो जगामाद्भुतदर्शनः ।
विशाखस्तु ययौ येन देवी गिरिवरात्मजा ॥ ३९ ॥
इस प्रकार अपने-आपको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके अद्भुत दिखायी देनेवाले प्रभावशाली भगवान् स्कन्द जहाँ रुद्र थे, उधर ही गये। विशाख उस ओर चल दिये, जिस ओर गिरिराजनन्दिनी उमा देवी बैठी थीं ॥