महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनक्षये वर्तति तत्र दारुणे ।
महाबलास्ते कुपिताः परस्परं
निषूदयन्तः प्रविचेरुरोजसा ॥ ७९ ॥
वहाँ वह भयंकर जनसंहार हिंसक जन्तुओं, पक्षियों तथा राक्षसोंको आनन्द प्रदान करनेवाला था। उसमें कुपित हुए वे महाबली शूरवीर एक-दूसरेको मारते हुए बलपूर्वक विचरण कर रहे थे ॥ ७९ ॥
ततो बले भृशलुलिते परस्परं
निरीक्षमाणे रुधिरौघसम्प्लुते ।
दिवाकरेऽस्तंगिरिमास्थिते शनै-
रुभे प्रयाते शिबिराय भारत ॥ ८० ॥
भरतनन्दन! दोनों ओरकी सेनाएँ अत्यन्त आहत होकर खूनसे लथपथ हो एक-दूसरीकी ओर देख रही थीं, इतनेहीमें सूर्यदेव अस्ताचलको जा पहुँचे। फिर तो वे दोनों ही धीरे-धीरे अपने-अपने शिविरकी ओर चल दीं ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्वादशदिवसावहारे
द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें बारहवें दिनके युद्धमें सेनाका युद्धसे विरत हो अपने शिविरको प्रस्थानविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥