महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2727, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्चायै चार्थिनां राजन् कॢप्तानि बहुशस्तथा ॥ २४ ॥
राजन्! उस समय उन्होंने देश-देशमें थके-माँदे रोगी, बालक और वृद्धोंका सत्कार करनेके लिये नाना प्रकारकी देनेयोग्य वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें तैयार करा रखी थीं॥
तानि यानीह देशेषु प्रतीक्षन्ति स्म भारत ।
बुभुक्षितानामर्थाय कॢप्तमन्नं समन्ततः ॥ २५ ॥
भारत! विभिन्न देशोंमें लोग जिन वस्तुओंकी इच्छा रखते थे, उन्हें वे ही दी जाती थीं। भूखोंको भोजन करानेके लिये सर्वत्र अन्नका प्रबन्ध किया गया था॥
यो यो यत्र द्विजो भोज्यं भोक्तुं कामयते तदा ।
तस्य तस्य तु तत्रैवमुपजहुस्तदा नृप ॥ २६ ॥
नरेश्वर! जिस किसी देशमें जो-जो ब्राह्मण जब कभी भोजनकी इच्छा प्रकट करता, बलरामजीके सेवक उसे वहीं तत्काल खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित करते थे॥ २६॥
तत्र तत्र स्थिता राजन् रौहिणेयस्य शासनात् ।
भक्ष्यपेयस्य कुर्वन्ति राशींस्तत्र समन्ततः ॥ २७ ॥
राजन्! रोहिणीकुमार बलरामजीकी आज्ञासे उनके सेवक विभिन्न तीर्थस्थानोंमें खाने-पीनेकी वस्तुओंके ढेर लगाये रखते थे॥ २७॥
वासांसि च महार्हाणि पर्यङ्कास्तरणानि च ।
पूजार्थं तत्र कॢप्तानि विप्राणां सुखमिच्छताम् ॥ २८ ॥
सुख चाहनेवाले ब्राह्मणोंके सत्कारके लिये बहुमूल्य वस्त्र, पलंग और बिछौने तैयार रखे जाते थे॥ २८॥
यत्र यः स्वपते विप्रो यो वा जागर्ति भारत ।
तत्र तत्र तु तस्यैव सर्वं कॢप्तमदृश्यत ॥ २९ ॥
भारत! जो ब्राह्मण जहाँ भी सोता या जागता था, वहाँ-वहाँ उसके लिये सारी आवश्यक वस्तुएँ सदा प्रस्तुत दिखायी देती थीं॥ २९॥
यथासुखं जनः सर्वो याति तिष्ठति वै तदा ।
यातुकामस्य यानानि पानानि तृषितस्य च ॥ ३० ॥
बुभुक्षितस्य चान्नानि स्वादूनि भरतर्षभ ।
उपजहुर्नरास्तत्र वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस यात्रामें सब लोग सुखपूर्वक चलते और विश्राम करते थे। यात्रीकी इच्छा हो तो उसे सवारियाँ दी जाती थीं, प्यासेको पानी और भूखेको स्वादिष्ट अन्न दिये जाते थे। साथ ही वहाँ बलरामजीके सेवक वस्त्र और आभूषण भी भेंट करते थे॥ ३०-३१॥
स पन्थाः प्रभभौ राजन् सर्वस्यैव सुखावहः ।
स्वर्गोपमस्तदा वीर नराणां तत्र गच्छताम् ।