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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2725, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2725

भगवान्‌ने हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्रसे भेंट की और उनसे सबके लिये विशेष हितकारक एवं यथार्थ बातें कहीं॥ ६ १/२ ॥

न च तत् कृतवान् राजा यथा ख्यातं हि तत् पुरा ॥ ७ ॥
अनवाप्य शमं तत्र कृष्णः पुरुषसत्तमः ।
आगच्छत महाबाहुरुपप्लव्यं जनाधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! किंतु राजा धृतराष्ट्रने भगवान्‌का कहना नहीं माना। यह सब बात पहले यथार्थरूपसे बतायी गयी है। महाबाहु पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ संधि करानेमें सफलता न मिलनेपर पुनः उपप्लव्यमें ही लौट आये ॥ ७-८ ॥

ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जितः ।
अक्रियायां नरव्याघ्र पाण्डवानिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
नरव्याघ्र! कार्य न होनेपर धृतराष्ट्रसे विदा ले वहाँसे लौटे हुए श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥

न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः ।
निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥ १० ॥
‘कौरव कालके अधीन हो रहे हैं, इसलिये वे मेरा कहना नहीं मानते हैं। पाण्डवो! अब तुमलोग मेरे साथ पुष्य नक्षत्रमें युद्धके लिये निकल पड़ो, ॥ १० ॥

ततो विभज्यमानेषु बलेषु बलिनां वरः ।
प्रोवाच भ्रातरं कृष्णं रौहिणेयो महामनाः ॥ ११ ॥
इसके बाद जब सेनाका बँटवारा होने लगा, तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महामना बलदेवजीने अपने भाई श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ११ ॥

तेषामपि महाबाहो साहाय्यं मधुसूदन ।
क्रियतामिति तत् कृष्णो नास्य चक्रे वचस्तदा ॥ १२ ॥
‘महाबाहु मधुसूदन! उन कौरवोंकी भी सहायता करना। परंतु श्रीकृष्णने उस समय उनकी यह बात नहीं मानी’ ॥ १२ ॥

ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः ।
तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः ॥ १३ ॥
इससे मन-ही-मन कुपित और खिन्न होकर महायशस्वी यदुनन्दन हलधर सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये चल दिये ॥ १३ ॥

मैत्रनक्षत्रयोगे स्म सहितः सर्वयादवैः ।
आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिंदमः ॥ १४ ॥
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले कृतवर्माने सम्पूर्ण यादवोंके साथ अनुराधानक्षत्रमें दुर्योधनका पक्ष ग्रहण किया ॥ १४ ॥

युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ।