महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2720, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धभूमिं गतौ वीरावुभावेव रराजतुः ।
तदनन्तर गदा हाथमें लेकर दुर्योधन और भीमसेन युद्ध-भूमिमें उतरे। वे दोनों ही वीर वहाँ बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७ १/२ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा परिष्वज्य हलायुधम् ।। ८ ।।
स्वागतं कुशलं चास्मै पर्यपृच्छद् यथातथम् ।
उस समय राजा युधिष्ठिरने बलरामजीको हृदयसे लगाकर उनका स्वागत किया और यथोचितरूपसे उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ १/२ ॥
कृष्णौ चापि महेष्वासावभिवाद्य हलायुधम् ।। ९ ।।
सस्वजाते परिप्रीतौ प्रीयमाणौ यशस्विनौ ।
यशस्वी महाधनुर्धर श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बलरामजीको प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्न हो प्रेमपूर्वक उनके हृदयसे लग गये ॥ ९ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।। १० ।।
अभिवाद्य स्थिता राजन् रौहिणेयं महाबलम् ।
राजन्! माद्रीके दोनों शूरवीर पुत्र नकुल-सहदेव और द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी रोहिणीनन्दन महाबली बलरामजीको प्रणाम करके उनके पास विनीतभावसे खड़े हो गये ।।
भीमसेनोऽथ बलवान् पुत्रस्तव जनाधिप ।। ११ ।।
तथैव चोद्यतगदौ पूजयामासुर्बलम् ।
नरेश्वर! भीमसेन और आपका बलवान् पुत्र दुर्योधन इन दोनोंने गदाको ऊँचे उठाकर बलरामजीके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया ॥ ११ १/२ ॥
स्वागतेन च ते तत्र प्रतिपूज्य समन्ततः ।। १२ ।।
पश्य युद्धं महाबाहो इति ते राममब्रुवन् ।
एवमूचुर्महात्मानं रौहिणेयं नराधिपाः ।। १३ ।।
वे सब नरेश सब ओरसे स्वागतपूर्वक समादर करके वहाँ महात्मा रोहिणीपुत्र बलरामजीसे बोले—‘महाबाहो! युद्ध देखिये’ ॥ १२-१३ ॥