महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2703, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिष्ट्या त्वमपि जानीषे क्षत्रधर्मं सुयोधन ॥ २३ ॥
दिष्ट्या ते वर्तते बुद्धिर्युद्धायैव महाभुज ।
दिष्ट्या शूरोऽसि कौरव्य दिष्ट्या जानासि संगरम् ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर बोले— सुयोधन! सौभाग्यकी बात है कि तुम भी क्षत्रिय-धर्मको जानते हो। महाबाहो! यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अभी तुम्हारा विचार युद्ध करनेका ही है। कुरुनन्दन! तुम शूरवीर हो और युद्ध करना जानते हो—यह हर्ष और सौभाग्यकी बात है ॥
यस्त्वमेको हि नः सर्वान् संगरे योद्धुमिच्छसि ।
एक एकेन संगम्य यत् ते सम्मतमायुधम् ॥ २५ ॥
तत् त्वमादाय युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वयं स्थिताः ।
तुम रणभूमिमें अकेले ही एक-एकके साथ भिड़कर हम सब लोगोंसे युद्ध करना चाहते हो तो ऐसा ही सही। जो हथियार तुम्हें पसंद हो, उसीको लेकर हमलोगोंमेंसे एक-एकके साथ युद्ध करो। हम सब लोग दर्शक बनकर खड़े रहेंगे ॥ २५ १/२ ॥
स्वयमिष्टं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ॥ २६ ॥
हत्वैकं भवतो राज्यं हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ।
वीर! मैं स्वयं ही पुनः तुम्हें यह अभीष्ट वर देता हूँ कि ‘हममेंसे एकका भी वध कर देनेपर सारा राज्य तुम्हारा हो जायगा अथवा यदि तुम्हीं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त करोगे' ॥ २६ १/२ ॥
दुर्योधन उवाच
एकश्चेद् योद्धुमाक्रन्दे शूरोऽद्य मम दीयताम् ॥ २७ ॥
आयुधानामियं चापि वृता त्वत्सम्मते गदा ।
दुर्योधन बोला— राजन्! यदि ऐसी बात है तो इस महासमरमें मेरे साथ लड़नेके लिये आज किसी भी एक शूरवीरको दे दो और तुम्हारी सम्मतिके अनुसार हथियारोंमें मैंने एकमात्र इस गदाका ही वरण किया है ॥ २७ १/२ ॥
हन्तैकं भवतामेकः शक्यं मां योऽभिमन्यते ॥ २८ ॥
पदातिर्गदया संख्ये स युध्यतु मया सह ।
मैं हर्षके साथ कह रहा हूँ कि 'तुममेंसे कोई भी एक वीर जो मुझ अकेलेको जीत सकनेका अभिमान रखता हो, वह रणभूमिमें पैदल ही गदाद्वारा मेरे साथ युद्ध करे' ॥
वृत्तानि रथयुद्धानि विचित्राणि पदे पदे ॥ २९ ॥
इदमीकं गदायुद्धं भवत्वद्याद्भुतं महत् ।
रथके विचित्र युद्ध तो पग-पगपर हुए हैं। आज यह एक अत्यन्त अद्भुत गदायुद्ध भी हो जाय ॥ २९ १/२ ॥
अस्त्राणामपि पर्यायं कर्तुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ३० ॥