महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2691, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् श्रीकृष्णने कहा—भारत! मायावी दुर्योधनकी इस मायाको आप मायाद्वारा ही नष्ट कर डालिये! युधिष्ठिर! मायावीका वध मायासे ही करना चाहिये, यह सच्ची नीति है॥ ६ १/२॥
क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्मायामप्सु प्रयोज्य च॥ ७॥
जहि त्वं भरतश्रेष्ठ मायात्मानं सुयोधनम्।
भरतश्रेष्ठ! आप बहुत-से रचनात्मक उपायोंद्वारा जलमें मायाका प्रयोग करके मायामय दुर्योधनका वध कीजिये॥ ७ १/२॥
क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण निहता दैत्यदानवाः॥ ८॥
क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्बलिर्बद्धो महात्मना।
क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्हिरण्याक्षो महासुरः॥ ९॥
रचनात्मक उपायोंसे ही इन्द्रने बहुत-से दैत्य और दानवोंका संहार किया, नाना प्रकारके रचनात्मक उपायोंसे ही महात्मा श्रीहरिने बलिको बाँधा और बहुसंख्यक रचनात्मक उपायोंसे ही उन्होंने महान् असुर हिरण्याक्षका वध किया था॥ ८-९॥
हिरण्यकशिपुश्चैव क्रिययैव निष्षूदितौ।
वृत्रश्च निहतो राजन् क्रिययैव न संशयः॥ १०॥
क्रियात्मक प्रयत्नके द्वारा ही भगवान्ने हिरण्यकशिपु-को भी मारा था। राजन्! वृत्रासुरका वध भी क्रियात्मक उपायसे ही हुआ था, इसमें संशय नहीं है॥ १०॥
तथा पौलस्त्यतनयो रावणो नाम राक्षसः।
रामेण निहतो राजन् सानुबन्धः सहानुगः॥ ११॥
क्रिया योगमास्थाय तथा त्वमपि विक्रम।
राजन्! पुलस्त्यकुमार विश्रवाका पुत्र रावण नामक राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा क्रियात्मक उपाय और युक्तिकौशलके सहारे ही सम्बन्धियों और सेवकोंसहित मारा गया, उसी प्रकार आप भी पराक्रम प्रकट करें॥ ११ १/२॥
क्रियाभ्युपायैर्निहतौ मया राजन् पुरातनौ॥ १२॥
तारकश्च महादैत्यो विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्।
नरेश्वर! पूर्वकालके महादैत्य तारक और पराक्रमी विप्रचित्तिको मैंने क्रियात्मक उपायोंसे ही मारा था॥ १२ १/२॥
वातापिरिल्वलश्चैव त्रिशिराश्च तथा विभो॥ १३॥
सुन्दोपसुन्दावसुरौ क्रिययैव निष्षूदितौ।
क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण त्रिदिवं भुज्यते विभो॥ १४॥
प्रभो! वातापि, इल्वल, त्रिशिरा तथा सुन्द-उपसुन्द नामक असुर भी कार्यकौशलसे ही मारे गये हैं। क्रियात्मक उपायोंसे ही इन्द्र स्वर्गका राज्य भोगते हैं॥ १३-१४॥
क्रिया बलवती राजन् नान्यत् किंचिद् युधिष्ठिर।