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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2668, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2668

संजय! मैं यह बात पूछ रहा हूँ, तुम मुझे बताओ; क्योंकि यह सब बतानेमें तुम कुशल हो। अपनी सेनाका संहार हुआ देखकर अकेले बचे हुए मेरे मूर्ख पुत्र राजा दुर्योधनने क्या किया? ।। २१ १/२ ।।

संजय उवाच

रथानां द्वे सहस्रे तु सप्त नागशतानि च ।। २२ ।।
पञ्च चाश्वसहस्राणि पत्तीनां च शतं शताः ।
एतच्छेषमभूद् राजन् पाण्डवानां महद् बलम् ।। २३ ।।
**संजयने कहा—**राजन्! पाण्डवोंकी विशाल सेनामें-से केवल दो हजार रथ, सात सौ हाथी, पाँच हजार घोड़े और दस हजार पैदल बच गये थे ।। २२-२३ ।।

परिगृह्य हि यद् युद्धे धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ।
एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः ।। २४ ।।
इन सबको साथ लेकर सेनापति धृष्टद्युम्न युद्धभूमिमें खड़े थे। उधर राजा दुर्योधन अकेला हो गया था ।। २४ ।।

नापश्यत् समरे कंचित् सहायं रथिनां वरः ।
नर्दमानान् परान् दृष्ट्वा स्वबलस्य च संक्षयम् ।। २५ ।।
तथा दृष्ट्वा महाराज एकः स पृथिवीपतिः ।
हतं स्वहयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद् भयात् ।। २६ ।।
महाराज! रथियोंमें श्रेष्ठ दुर्योधनने जब समरभूमिमें अपने किसी सहायकको न देखकर शत्रुओंको गर्जते देखा और अपनी सेनाके विनाशपर दृष्टिपात किया, तब वह अकेला भूपाल अपने मरे हुए घोड़ेको वहीं छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग चला ।। २५-२६ ।।

एकादशचमूर्भर्ता पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
गदामादाय तेजस्वी पदातिः प्रस्थितो ह्रदम् ।। २७ ।।
जो किसी समय ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका सेनापति था, वही आपका तेजस्वी पुत्र दुर्योधन अब गदा लेकर पैदल ही सरोवरकी ओर भागा जा रहा था ।। २७ ।।

नातिदूरं ततो गत्वा पद्भ्यामेव नराधिपः ।
सस्मार वचनं क्षत्तुर्धर्मशीलस्य धीमतः ।। २८ ।।
अपने पैरोंसे ही थोड़ी ही दूर जानेके पश्चात् राजा दुर्योधनको धर्मशील बुद्धिमान् विदुरजीकी कही हुई बातें याद आने लगीं ।। २८ ।।

इदं नूनं महाप्राज्ञो विदुरो दृष्टवान् पुरा ।
महद् वैशसमस्माकं क्षत्रियाणां च संयुगे ।। २९ ।।