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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2615, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2615

ततस्तु सौबलो राजन्नभ्यतिक्रम्य पाण्डवान् ।
जघान पृष्ठतः सेनां जयगृद्धः प्रतापवान् ॥ ४० ॥
राजन्! उधर विजयाभिलाषी प्रतापी सुबलपुत्र शकुनि पाण्डवोंका उल्लंघन करके पीछेकी ओरसे उनकी सेनाका संहार कर रहा था ॥ ४० ॥

अश्वारोहास्तु संरब्धाः पाण्डवानां तरस्विनाम् ।
प्राविशन् सौबलानीकमभ्यतिक्रम्य तान् रथान् ॥ ४१ ॥
वेगशाली पाण्डवोंके घुड़सवारोंने अत्यन्त कुपित होकर उन कौरव रथियोंका उल्लंघन करके सुबलपुत्रकी सेनामें प्रवेश किया ॥ ४१ ॥

ते तत्र सादिनः शूराः सौबलस्य महद् बलम् ।
रणमध्ये व्यतिष्ठन्त शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ४२ ॥
वे शूरवीर घुड़सवार वहाँ जाकर रणभूमिके मध्यभागमें खड़े हो गये और शकुनिकी उस विशाल सेनापर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४२ ॥

तदुद्यतगदाप्रासमकापुरुषसेवितम् ।
प्रावर्तत महद् युद्धं राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ४३ ॥
राजन्! फिर तो आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप वह महान् युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंसे नहीं, वीर पुरुषोंसे सेवित था। उस समय सभी योद्धाओंके हाथोंमें गदा अथवा प्रास उठे रहते थे ॥ ४३ ॥

उपारमन्त ज्याशब्दाः प्रेक्षका रथिनोऽभवन् ।
न हि स्वेषां परेषां वा विशेषः प्रत्यदृश्यत ॥ ४४ ॥
धनुषकी प्रत्यंचाके शब्द बंद हो गये। रथी योद्धा दर्शक बनकर तमाशा देखने लगे। उस समय अपने या शत्रुपक्षके योद्धाओंमें पराक्रमकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ॥ ४४ ॥

शूरबाहुविसृष्टानां शक्तीनां भरतर्षभ ।
ज्योतिषामिव सम्पातमपश्यन् कुरुपाण्डवाः ॥ ४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! शूरवीरोंकी भुजाओंसे छूटी हुई शक्तियाँ शत्रुओंपर इस प्रकार गिरती थीं, मानो आकाशसे तारे टूटकर पड़ रहे हों। कौरव-पाण्डवयोद्धाओंने इसे प्रत्यक्ष देखा था ॥

ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च तत्र तत्र विशाम्पते ।
सम्पतन्तीभिराकाशमावृतं बह्वशोभत ॥ ४६ ॥
प्रजानाथ! वहाँ गिरती हुई निर्मल ऋष्टियोंसे व्याप्त हुए आकाशकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४६ ॥

प्रासानां पततां राजन् रूपमासीत् समन्ततः ।
शलभानामिवाकाशे तदा भरतसत्तम ॥ ४७ ॥