महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2570, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहतस्यापचितिं भ्रातुश्चिकीर्षुर्यूद्धदुर्मदः ।
मारे गये भाईका प्रतिशोध लेनेकी इच्छासे वह रणदुर्मद नरश्रेष्ठ वीर बड़ी उतावलीके साथ उन्हें बहुत-से नाराचोंद्वारा घायल करने लगा ।। ६२ १/२ ।।
तं विव्याधाशुगैः षड्भिर्धर्मराजस्त्वरन्निव ।। ६३ ।।
कार्मुकं चास्य चिच्छेद क्षुराभ्यां ध्वजमेव च ।
तब धर्मराजने उसे शीघ्रतापूर्वक छः बाणोंसे बींध डाला तथा दो क्षुरोंसे उसके धनुष और ध्वजको काट दिया ।।
ततोऽस्य दीप्यमानेन सुदृढेन शितेन च ।। ६४ ।।
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरच्छिरः ।
तत्पश्चात् एक चमकीले, सुदृढ़ और तीखे भल्लसे सामने खड़े हुए उस राजकुमारके मस्तकको काट गिराया ।। ६४ १/२ ।।
सकुण्डलं तद् ददृशे पतमानं शिरो रथात् ।। ६५ ।।
पुण्यक्षयमनुप्राप्य पतन् स्वर्गादिव च्युतः ।
पुण्य समाप्त होनेपर स्वर्गसे भ्रष्ट हो नीचे गिरनेवाले जीवकी भाँति उसका वह कुण्डलसहित मस्तक रथसे भूतलपर गिरता देखा गया ।। ६५ १/२ ।।
तस्यापकृत्तशीर्षं तु शरीरं पतितं रथात् ।। ६६ ।।
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं दृष्ट्वा सैन्यमभज्यत ।
फिर खूनसे लथपथ हुआ उसका शरीर भी, जिसका सिर काट लिया गया था, रथसे नीचे गिर पड़ा। उसे देखकर आपकी सेनामें भगदड़ मच गयी ।। ६६ १/२ ।।
विचित्रकवचे तस्मिन् हते मद्रनृपानुजे ।। ६७ ।।
हाहाकारं प्रकुर्वाणाः कुरवोऽभिप्रदुद्रुवुः ।
मद्रनरेशका वह छोटा भाई विचित्र कवचसे सुशोभित था, उसके मारे जानेपर समस्त कौरव हाहाकार करते हुए भाग चले ।। ६७ १/२ ।।
शल्यानुजं हतं दृष्ट्वा तावकास्त्यक्तजीविताः ।। ६८ ।।
वित्रैसुः पाण्डवभयाद् रजोध्यस्तास्तदा भृशम् ।
शल्यके भाईको मारा गया देख धूलिधूसरित हुए आपके सारे सैनिक पाण्डुपुत्रके भयसे जीवनकी आशा छोड़कर अत्यन्त त्रस्त हो गये ।। ६८ १/२ ।।
तांस्तथा भज्यमानांस्तु कौरवान् भरतर्षभ ।। ६९ ।।
शिनेर्नप्ता किरन् बाणैरभ्यवर्तत सात्यकिः ।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भागते हुए उन कौरव-योद्धाओंपर बाणोंकी वर्षा करते हुए शिनिपौत्र सात्यकि उनका पीछा करने लगे ।। ६९ १/२ ।।
तमायान्तं महेष्वासं दुष्प्रसह्यं दुरासदम् ।। ७० ।।